सहस्रकूट विज्ञातीर्थ के अध्यक्ष अनिल बनेठा को मिला गुरू मां से चातुर्मास कलश
गुंसी
श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ गुंसी (राज.) में विराजमान भारत गौरव श्रमणी गणिनी आर्यिका रत्न 105 विज्ञाश्री माताजी ससंघ सहित श्रावकों को भी नित्य स्वाध्याय ध्यान , अध्ययन आदि का क्रम निरन्तर चल रहा है । निवाई चाकसू आदि समाजों के भक्तगण गुरु माँ की चर्या से जुड़ने पहुंच रहे हैं ।
पूज्य माताजी ने सभी को धर्मोपदेश देते हुए कहा कि – जीवन में कर्म के साथ धर्म भी करना जरूरी है । यदि हम कर्म ही करते रहे तो हमारा जीवन नरक निगोद के गर्त में चला जायेगा । और धर्म के माध्यम से हम स्वर्ग मोक्ष के सुख को प्राप्त कर सकते हैं । जीवन में जब धर्म नहीं होगा तो कर्म का फल भी नहीं मिलेगा । आज के समय में मानव को शादी पार्टी में जाने का समय बहुत व्यस्त रहने के बाद भी मिल जाता है लेकिन जब बात धर्म करने की , मन्दिर में भक्ति की , साधु – संतों की सेवा की आती है तो सब कहते हैं हमें समय नहीं मिलता । नर तन है अनमोल इसको माटी में मत घोल । अब जो मिला है फिर न मिलेगा कभी नहीं कभी नहीं कभी नहीं । बोलते तो सब है लेकिन जीवन में कोई नहीं उतारता।




जिस दिन इस सूक्ति को जीवन में चरितार्थ कर लोगे तो इस तन की कीमत समझ आने लगेगी । स्वर्ग के देवता भी इस तन को पाने तरसते हैं और हमें यह मिल गया तो हम धर्म से विमुख होकर इसे बर्बाद कर रहे हैं ।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
