सिद्ध चक्र महामंडल विधान सबसे पहले शुभचंद्र महाराज ने संस्कृत भाषा में लिखा था पदम सागर महाराज

धर्म

सिद्ध चक्र महामंडल विधान सबसे पहले शुभचंद्र महाराज ने संस्कृत भाषा में लिखा था पदम सागर महाराज
चंदेरी
पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर में पूज्य मुनि श्री पदम सागर महाराज सानिध्य में सिद्ध चक्र महामंडल विधान का आयोजन हो रहा है, जबलपुर से पधारे लल्लन भइया के कुशल मार्गदर्शन में यह महामंडल विधान संपन्न हो रहा है।

 

 

 

रविवार की अनुपम बेला में पूज्य मुनि श्री पदम सागर महाराज ने सिद्ध चक्र महामंडल का विधान एवं उसके विषय में जानकारी सभी को प्रदान की महाराज श्री ने कहा कि सिद्ध चक्र महामंडल विधान के द्वारा ही जाना जा सकता है कि सिद्धों में गुण कौन से हैं और सिद्धों का स्वरूप कैसा है। उनके गुणों का अवलोकन सिद्ध चक्र महामंडल विधान के द्वारा ही होता है।

सिद्ध चक्र महामंडल विधान सबसे पहले किसने लिखा
महाराज श्री ने बताया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान सबसे पहले शुभचंद्र महाराज ने लिखा संस्कृत भाषा में जब उन्होंने इसे लिखा था तब संस्कृत भाषा को जानने वाले लोग ज्यादा नहीं थे। और कम पढ़े लिखे लोग हुआ करते थे। यह संस्कृत का विधान 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में लिखा गया था बाद में संस्कृत के महाकवि सहारनपुर निवासी जो एक संत थे उन्होंने संस्कृत का हिंदी रूपांतरण किया। तब से हम भक्ति भाव से पूजन करके विधान करके अपने कर्मों की निर्जरा कर रहे।

 

 

 

 

 

 

     

 

सन 1934 में यह महामंडल विधान संस्कृत से हिंदी में रूपांतरण किया गया। उन्होंने कहा सिद्ध चक्र महामंडल विधान को लघु समयसार भी कहा जाता है, इस महामंडल विधान के करने से भगवान के सर्वांग से ओंकार ध्वनि निकलती है। यह धुनी एक बीजाक्षर के बराबर होती है। एक बीजाक्षर जबरदस्त पावरफुल होता है। इस बीजाक्षर में 112 करोड़ 83 लाख 58 हजार एवम पाच पद होते हैं। और इन संपूर्ण बीजाक्षरो का जिनवाणी के माध्यम से सर्वांग सिद्धि का देव भी अगर मनन चिंतन करता है तो उसको भी 33 सागर कम पड़ जाएंगे।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *