*संस्कार मानव जीवन की पहचान :- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी*
गुन्सी
श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ गुन्सी (राज.) में ससंघ विराजित भारत गौरव गणिनी आर्यिका रत्न 105 विज्ञाश्री माताजी आस पास की समाजों में धर्म की महती प्रभावना कर रही हैं । गुरु माँ के उपवास के बाद पारणा कराने का सौभाग्य विवेक विहार जयपुर व निवाई समाज को प्राप्त हुआ ।
पूज्य माताजी ने सभी को संस्कारवान बनने व बनाने की प्रेरणा देते हुए कहा कि – संस्कारों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। यदि संस्कार न हों तो हमारी सामाजिक जिम्मेदारियां और सामाजिक भागीदारी शून्य होगी। संस्कारों की पहली पाठशाला घर से शुरू होती है। हम जो घर से सीखते हैं, वही बाहर करते हैं।




इसके बाद स्कूल में संस्कारों का समायोजन होता है। इसके अलावा संस्कारों में एक अहम संस्कार है, जिसे परोपकार कहा जाता है। परोपकार के जरिए ही समाज में हम एक दूसरे की भावनाओं को समझ पाते हैं। इसी के जरिए हम एक दूसरे की मदद के लिए प्रेरित होते हैं। यदि यह संस्कार न हो तो हम समाज में कोई स्थान प्राप्त नहीं कर सकते। लिहाजा, संस्कारों की कड़ी में हमें परोपकार के बारे में पता होना चाहिए और इसका अनुपालन भी सुनिश्चित करना चाहिए। तभी हम समाज में विशिष्ट स्थान बना पाने में कामयाब हो सकते हैं।जीवन में आगे बढ़ने के लिए अच्छे संस्कार तथा अनुशासन बहुत आवश्यक है। उसके लिए हर कार्य चाहे वह पढ़ाई का हो, खेल, अथवा अन्य कार्य हों उसमें एक निश्चित समय अवधि का होना बहुत आवश्यक है। उसके लिए हमें अपने गुरु तथा माता-पिता बड़ों का सम्मान करना आवश्यक है। साथ ही हमें अपनी सोच को सकारात्मक रखना आवश्यक है। तभी हम समाज में आगे बढ़ सकते हैं और देश को तरक्की में अपना अमूल्य योगदान दे सकते हैं। संस्कारों में परोपकार सबसे अहम है। हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए, तभी एक समृद्ध और सुरक्षित समाज का निर्माण होगा। संस्कार ही हमें आगे बढ़ने के प्रेरित करते हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
