सागर वालो पर गुरुदेव की क्रपा सबसे ज्यादा बरसती है अजित सागर महाराज
सागर
विश्व वंदनीय आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज के परम शिष्य मुनिश्री अजित सागर महाराज ने अपने उद्बोधन मे भावना का विशेष महत्व बताया
महाराज श्री ने धातु एवम पाषाण का उदाहरण देते हुए कहा की धातु या पाषाण को पूज्यता त धातु या पाषाण को तक नहीं मिलती जब तक वो मूल स्वरुप मे रहती है लेकिन पाषाण और धातु को मूर्ति का स्वरुप देकर परिवर्तित कर उसकी प्रतिष्ठा हो जाए तो वह पूज्य हो जाती है भावना का बहुत प्रभाव होता है भाव से ही व्यक्ति पाषाण और धातु क परमात्मा बना देता है

भाग्योदय तीर्थ पर नवीन वेदी श्री जी विराजमान के अवसर पर मुनि श्री अजित सागर महाराज ने कहा आपके जीवन मे मंदिर निर्माण एवम राई के बराबर प्रतिमा विराजमान करने का अवसर मिले तो यह सातिशय पुण्य है उन्होने कहा चाहे दान करे या समय का दान करे यह भी एक योगदान होता है यह भी एक जिनेद्र भक्ति है
उन्होने आचार्य श्री को स्मृति लाते हुए एवम सागर वालो के विषय मे कहा की आचार्य श्री ने जो सर्वोतोभद्र जिनालय के निर्माण का संकल्प कराया है आपके पुण्य क कारण ही सागर पवित्र भूमि बन रहा है गुरुदेव का सपना सागर वाले पूरा कर रहे है और सागर वालो पर ही गुरुदेव की कृपा सबसे ज्यादा बरसती है



कुण्डलपुर का जिक्र करते हुए कहा कुण्डलपुर का जिनालय 8.5 लाख घन फुट पत्थर से निर्मित हुआ है लेकिन सागर का यह जिनालय 11 लाख घन फुट पत्थर से बन रहा है यह विश्व का सबसे बड़ा जिनालय होगा
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी
