मुनि श्री मुक्ति सागर जी का समाधि मरण उपरांत देह के विधि पूर्वक अग्नि संस्कार हुए
साबला
पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री 108 वर्धमान सागर जी महाराज के 75 वर्षीय शिष्य मुनि श्री 108 मुक्तिसागर महाराज का 10 दिसंबर को सलेखना पूर्वक समाधि मरण हुआ। उनकी डोला विमान यात्रा निकाली गई।
उसके उपरांत श्री अजित कीर्ति गिरी पर विधि विधान मंत्रोचार पूर्वक पूजन अभिषेक कर अग्नि संस्कार किए गए। इस अवसर पर आचार्य श्री संघ के सभी साधु तथा हजारों समाज जन उपस्थित रहे।

आचार्य श्री ने उपदेश में बताया कि सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र रूप रत्नत्रय सहित परिणामों, भावों के रहते हुए इस देह का विसर्जन त्याग या छोड़ना समाधिमरण कहलाता है। समाधिमरण का दूसरा नाम शास्त्रों में सल्लेखनामरण के नाम से देखने में आता है और सल्लेखनामरण का अर्थ भी वही है कि सत् लेखना सत् सम्यक प्रकार से लेखना याने कृश करना नष्ट करना, किसे कृश करना कम करना शरीर व कषाय को सम्यक शब्द का अर्थ होता है किसी सांसारिक ख्याति लाभ पूजा से रहित होकर अन्तरंग और बहिरंग तपश्चरण करना सल्लेखना मरण कहलाता है। यह मंगल देशना साबला में श्री अजित कीर्ति गिरी में संघस्थ मुनि श्री 108 मुक्ति सागर जी महाराज की समाधि के अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागरजी महाराज ने प्रकट की।



आचार्य श्री ने कहा कि मृत्यु को अपनी आँखों से देखना समाधिमरण है और मृत्यु को अपनी आँखों से वही व्यक्ति देख सकता है जिसने अपनी आँखों से जन्म देखा होगा इसमें रहस्य यह उद्घाटित होता है कि माता से सब जन्म लेते हैं उस जन्म को वह बालक नहीं देख सकता है लेकिन जो जिनेंद्र वचनों पर श्रद्धान रखकर संसार शरीर भोगों से विरक्त होकर गुरु शरण में जाकर श्रावक के उत्कृष्ट पद या मुनि दीक्षा को ग्रहण करता है उसका दूसरा जन्म कहलाता है उसे शास्त्रों में द्विज कहते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने संयमी जीवन को (जन्म) अपनी आँखों से देखता है उसका मरण समाधिमरण कहलाता है। इसमें यही बात छिपी हुई है कि व्रत-संयम व तप के साथ मरना समाधिमरण कहलाता ।

राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि बेहोशी में मरना मौत है जो कि प्रायः सबकी होती है जो मरण महोत्सव का रूप धारण कर लें। जिस मरण में गुरुजन भी जिसकी अर्थी के साथ-साथ चले उस मरण को समाधिमरण कहते हैं। एक असंयमी भोगी-रागी-द्वेषी की अर्थी निकलती है , प्रवचन के पूर्वआचार्य श्री अजित सागर जी सहित अनेक साधुओं की समाधि भूमि , अनेक साधू की दीक्षा भूमि, जन्म भूमि साबला में

पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर से दीक्षित शिष्या 75 वर्षीय मुनिश्री मुक्ति सागर जी का दिनांक 10 दिसंबर 2023 को रात्रि में 10.32 बजे साबला मे समाधिमरण हो गया। श्री बसंतीलाल,महेंद्र ,राकेश, बहादुर मल ने बताया कि आज प्रातः क्षपक समाधिस्थ श्री मुक्ति सागर जी महाराज का डोला विमान यात्रा वात्सल्य वारिघि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ सानिध्य में निकाली गई।समाधिस्थल परिसर में मंत्रोचार से शुद्धि की गई। मुनि श्री की पूजन शांति धारा और पंचामृत अभिषेक गृहस्थ अवस्था के पुत्र द्वारा किया गया। 10 दिसंबर 2023 को मुक्ति सागर महाराज ने आचार्य श्री एवम् संघ के सभी साधुओं से क्षमा याचना कर चारो प्रकार के अन्न जल आदि का आजीवन त्याग किया । निराकुलता सहित दिनांक 10 दिसंबर 2023 को रात्रि 10.32 बजे उत्कृष्ट समाधिमरण निर्यापकाचार्य आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी संघ सानिध्य में आचार्य श्री के श्री मुख से अरिहंत सिद्ध सुनते हुए हुआ। क्षपक मुनि श्री की विमान डोल यात्रा दिगंबर मंदिर साबला से रवाना होकर श्री अजित कीर्ति गिरी पहुंची।डोल यात्रा मे नगर साबला सहित निकट के अनेक नगरों के हजारों गुरुभक्तों ने भाग लिया समाधिस्थल पर पूर्ण विधि विधान से विमान यात्रा पूर्व नियत स्थल पर ले गए जहाँ पर पूर्ण विधि विधान से समाधिस्थ मुनि श्री का पूजन पंचामृत अभिषेक उल्टे क्रम से किए गए। अग्नि संस्कार का सौभाग्य पूर्व गृहस्थ अवस्था के परिजनों द्वारा किये गए। उल्लेखनीय है कि साबला नगर में अनेक पुण्यशाली भव्य क्षपक साधुओं की पूर्व में समाधि हुई है।
केशलोचन हुए
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की शिष्याएं आर्यिका श्री मुदित मति, श्री पद्म यशमती, श्री दिव्य यश मति के साबला में केश लोचन हुए
राजेश पंचोलिया इंदौर
वात्सल्य वारिघि भक्त परिवार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
