जीवन में विवेक का महत्व :- गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी
गुन्सी
श्री दिगम्बर जैन सहस्रकूट विज्ञातीर्थ गुन्सी (राज.) में विराजमान भारत गौरव श्रमणी गणिनी आर्यिका रत्न 105 विज्ञाश्री माताजी के मुखारविंद से अभिषेक शांतिधारा करने का सौभाग्य हेमन्त जैन कापरेन , जिनेन्द्र जैन जयपुर , महेश जैन निवाई , शैलेन्द्रजैन निवाई , अरविंद जैन निवाई , गणेश जैन बडानयागांव वालों ने प्राप्त किया ।
पूज्य माताजी ने सभी को धर्मोपदेश देते हुए कहा कि – मनुष्य के अंदर अनंत शक्ति का भंडार है लेकिन सबसे बड़ी शक्ति है विवेक की। व्यक्ति विवेक के प्रकाश में चलता रहे तो दु:ख के कारण स्वतः समाप्त हो जाते हैं। भगवान महावीर ने कहा कि विवेक ही धर्म की जननी है। मनुष्य अविवेक के कारण जीव हिंसा करता है। केवल किसी का वध करना ही हिंसा नहीं है। प्राणी को मन, वचन, काया से कष्ट पहुंचाना भी हिंसा है। उन्होंने कहा आंख से अंधा व्यक्ति सुखी रह सकता है पर जिसमे विवेक नहीं है वह कभी सुखी नहीं रह सकता। विवेक इंसान को प्रकृति द्वारा अनुपम उपहार है।

विवेक का उचित प्रकार से प्रयोग करना आवश्यक है। महावीर का संदेश जियो और जीने दो जब सार्थक होगा, जब हर कार्य में विवेक का ध्यान रखा जाए। विवेकपूर्वक चलें, भोजन बनाते समय, खाते समय विवेक रखें।




विवेक उस आंख के समान है जिसके माध्यम से व्यक्ति भले और बुरे कार्य की पहचान कर सकता है। यदि विवेक नहीं होगा तो वह गलत रास्तों पर भी चला जाता है। विवेक के द्वारा व्यक्ति को कर्तव्य और अकर्तव्य का बोध कर सकता है। व्यक्ति कम बोले या नहीं बोले, यह महत्वपूर्ण नहीं है, पर महत्वपूर्ण यह है कि जो भी बोले विवेकपूर्वक बोले, जिसने विवेक को धारण कर लिया उसने वर्तमान और परलोक दोनों को सुधार लिया।
10 दिसम्बर 2023 को होने वाले पिच्छिका परिवर्तन एवं 108 फीट उत्तुंग कलशाकार सहस्रकूट जिनालय के भव्य शुभारम्भ में सम्मिलित होकर इस सुअवसर में साक्षी बनकर पुण्यार्जन करें ।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
