मेरे गुरुदेव निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव सुधासागर महाराज की सुंदरता आत्मा तक को श्रृंगारित कर देती हैं। श्रीश जैन ललितपुर की कलम से

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मेरे गुरुदेव निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव सुधासागर महाराज की सुंदरता आत्मा तक को श्रृंगारित कर देती हैं। श्रीश जैन ललितपुर की कलम से

ताज नगरी कही जाने वाली नगरी आगरा में मेरा जाना तब तब हुआ जब जब जगत पूज्य गुरुदेव के चरण आगरा में पड़े और यकीन मानिये में जितनी भी बार आगरा गया मेरा मन एक बार भी नही हुआ कि मुझे जाकर दुनिया का प्रसिद्ध अजूबा देखना हैं क्योंकि में जानता हूं इसकी सुंदरता मात्र चित्त को आकर्षित कर सकती हैं किंतु मेरे गुरुदेव निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव की सुंदरता आत्मा तक को श्रृंगारित कर देती हैं।

 

 

 

1999 और 2011 के प्रवास के दौरान तो सिद्ध न हुआ किन्तु अब 2023 में जाकर यह सार्वजनिक सिद्धि भी हो गयी जब ताजखेमा में पूज्य गुरुदेव ने विराजमान होकर अपना प्रवचन दिया प्रवचन के दौरान पूज्य गुरुदेव की पीठ ताज की ओर थी किन्तु दर्शकों के मुंह की दिशा जिस ओर थी उस दिशा में सामने मंच पर गुरुदेव विराजमान थे और ठीक उनके पीछे ताज की झिलमिलाती सफेद दूध सी चमकती दीवारें दिखाई दे रही थी किन्तु वहां उपस्थित सभी भक्तो के मन मे एक बार भी यह भाव नही आये कि मुझे ताज देखना हैं बल्कि वे तो मंत्रमुग्ध श्रोता की तरह पूज्य गुरुदेव के प्रवचनों को सुनकर उनकी मुख मुद्रा को देखकर प्रशन्न होते रहें और बस यही बात सिद्ध करती हैं कि आज भी मेरे सरताज के आंगे ताज फीका हैं।

 

जहां तक ताजखेमा के बारे में मुझे बताया गया हैं कि वहां विशेष लोगो को जाने की ही अनुमति मिलती हैं और वक्तव्य देना तो असाधारण बात मानी जाती हैं विश्व की मात्र कुछ ही विशेष हस्तियों ने ही अब तक वहां पहुँचकर अपना वक्तव्य दिया हैं जो मात्र पन्द्रह से बीस मिनिट का ही हुआ हैं लेकिन अबकी बार पूज्य गुरुदेव ने उस विशेष स्थान को और भी विशेष बना दिया जब उन्होंने अपने अम्रत रूपी वचनों की बरसात पूरे डेढ़ घण्टे तक अनवरत जारी रखी और पँचम काल का इससे बड़ा आश्चर्य क्या होगा कि श्रोता भी उतने लंबे समय तक बैठे एकाग्रचित्त हो सुनते रहे और खुश होते रहे,,,

 

 

 

 

यह तो ताज के सामने से हुए प्रवचन पर प्रतिक्रिया हैं सोचिए जब लोकोदय तीर्थ अपने पूरे शबाब पर होगा और गुरुदेव उसके सामने बैठ कर प्रवचन कर रहें होंगे उस दृश्य की कल्पना मात्र से शरीर मे सिहरन हो उठती हैं और में लाखों धन्यवाद देता हूं आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज को जिन्होंने पूज्यवर को यह इतिहास रचने आगरा की ओर भेजा ,,, पूज्यवर का आशीर्वाद हम सभी पर यू ही बना रहे इसी मंगल कामना के साथ
श्रीश_ललितपुर

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