दिशा दिखाने वाला सही मिल जाये,तो दीये का प्रकाश भी सूर्य का काम करता है..!अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज
कुलचाराम हैदराबाद
अन्तर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा किदिशा दिखाने वाला सही मिल जाये,तो दीये का प्रकाश भी सूर्य का काम करता है..!
मन और पानी के विषय में कहा कि संसार में मन और पानी दोनों
अधोगामी है।मन मंडी में लगेगा, क्योंकि मन अधोगामी है, बहिर्मुखी है। बाहर की तरफ भागना मन का सहज स्वभाव है, मन धर्म है। *
पानी की गति और मन की गति एक सी है। मन पानी की तरह नीचे की ओर बहता है।पानी जिधर गड्ढा होता है और जिधर ढ़लान होती है, उधर बहता है। मन की भी यही आदत है।








उन्होंने कहा मन जीवन की ऊंचाई को, आनंद की गहराई को, नहीं पहचानता, मन अनंत को नहीं जीता, मन विराट में नहीं रमता, वह शूद्र में रमता है। वह शूद्र में जीता है।
इन्द्रिय के विषय क्षुद्र नहीं तो और क्या है? वासना क्षुद्र नहीं तो और क्या है? भोग विलास क्षुद्र नहीं तो और क्या है? मन अणु को पकड़ता है। ब्रह्मांड को छोड़कर पिण्ड को पकड़ता है। चेतना को छोड़कर, जड़ को पकड़ता है।
लेकिन मन की इस आदत को, इस संस्कार को, परिवर्तित किया जा सकता है, बदला जा सकता है। मन को ऊर्ध्वगामी बनाया जा सकता है। पानी जो नीचे की ओर बह रहा है, यदि उसे यंत्र का यानि (टूल्लू पंप का) सहारा मिल जाए, तो पानी 20 मंजिल ऊपर पहुंच सकता है। और मन, जो नीचे की ओर भाग रहा है, उसे मंत्र का सहारा मिल जाये, तो ऊर्ध्वगामी बन सकता है।
यदि पानी को यंत्र और मन को मंत्र मिल जाए, तो दोनों ऊर्ध्वगामी बन सकते हैं।मंत्र, मन की मालीनता को, चित्त से दूर करता है। अतः मन को मंत्र का सहारा देना और मंत्र से ही मन की मृत्यु होती है। और मंत्र से ही मन को जीवन दान मिलता है…!!!। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
