जैन दर्शन में धनतेरस धन्य तेरस के रूप में मनाया जाता है पांच दिवसीय दिवाली पर शुरू होने जा रहा है, धनतेरस से यह पर्व आज से प्रारंभ होने जा रहा है।
प्रथम दिन धनतेरस के रूप में मनाया जाता है लेकिन जैन दर्शन में इसे धन्य तेरस ध्यान तेरस के रूप में मनाया जाता है। जिसके कई मायने हैं। हमें इसे जानना भी होगा और समझना भी होगा।

धनतेरस को जैन दर्शन के अनुसार धन्य तेरस या ध्यान तेरस कहा जाता है। ऐसा इसलिए है की भगवान महावीर स्वामी ने योग निरोध को आरंभ किया। तबसे यह तिथि को ‘धन्य’ माना जाने लगा और धन्य तेरस के रूप में मनाया जाने लगा।

वही श्रमण भगवान महावीर स्वामी धन्य तेरस के दिन से ही योग निरोध को आरंभ किया और कार्तिक कृष्ण अमावस्या दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुए
हमारी धारणा
इस पावन पर्व को हम सभी ने धनतेरस संपन्न कर लिया है। योग निरोध का यह पवित्र दिन धन्य तेरस की जगह अब धनतेरस हो गया है। धन के शिकंजे में हम इतना फ़ँसे हुए है की ज्ञानलक्ष्मी और मोक्षलक्ष्मी का यह दीपावली पुनीत पर्व भी धन की देवी समझे जानी वाली लक्ष्मी पूजा का पर्व बन गया है ।



ऐसा हो गया है वीतरागी वीतराग का संदेशवाहक बन गया है । केसे भी हो हमे सिर्फ धन आना चाहिए इस मिथ्या धारणा ने धर्म और जीवन को खण्ड – खण्ड कर दिया है ।
इस तृष्णा लोभ की आँधी में सभी लिप्त नजर आ रहे है।। हमने अपने जीवन को धर्म के प्रकाश से नहीं धन के अन्धकार से भर चुके है।

दीपों रूपी इस दुर्लभ नर तन रत्नदीप की गुणवत्ता और महत्ता को विस्मृत कर दिया है ।यह पर्व हमारे चिन्तन का पर्व है नर जन्म दुर्लभ मनुष पर्याय को सार्थक करने का पर्व है ।
यह महापर्व श्रमण भगवान महावीर के आदर्शों और जैन धर्म और दर्शन को समझने का पर्व है ।हम सभी जगमग प्रकाश करें, घरो में सजावट करे। और जब हम प्रकाश पुंज दीपक जलाए तब एक ज्योति दीप हम अपने लिए भी संयम और सद्गुणों का भी कम से कम एक दीप अपने ह्रदय में रखें तभी दीपावली पर्व मनाने की सार्थकता सिद्ध होगी।
यदि हम ऐसा कर पाए तो बहुत ही अकल्पनिक हो जाएगा की हमारे समक्ष शाश्वत उपलब्धियां का एक ऐसा खजाना संग्रहित होता जिसकी कभी हमने कल्पना भी नहीं की।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
