एमडी जैन इंटर कॉलेज हरीपर्वत में हुआ तीन दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी का शुभांरभ महान शक्तियाँ किसी को योगदान देना ही नही चाहती सुधासागर महाराज
आगरा
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के 2550वें निर्वाणोत्सव के उपलक्ष्य में निर्यापक मुनिपुगंव श्री सुधासागर महाराज ससंघ के मंगल सानिध्य में तीन दिवसीय राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी का शुभांरभ आगरा के हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के एमडी जैन इंटर कॉलेज ग्राउंड में 7 अक्टूबर को हुआ। राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी का शुभारंभ छोटे-छोटे बच्चों ने गुरू के चरणों में शीश नवाकर नमन किया और मनमोहक नृत्य की प्रस्तुति के साथ किया | इसके बाद सौभाग्यशाली भक्तों ने संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्जलवन किया |
राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी को श्रमण मुनिपुगंव श्री सुधा सागर जी महाराज ने संबोधित करते हुए कहा कि प्रत्येक वस्तु में एक प्रमेय गुण होता है जिसके कारण से वस्तु जानने में आती है। हम जान रहे है इतने मात्र से तुम ज्ञाता नही हो पाओगे जब तक वस्तु तुम्हारे लिए गुण प्रकट नहीं करेगी, आप जान नही पाएंगे। भगवान महावीर अपने आत्मा के स्वरूप में स्थित वो महाशक्ति थे जिन्होंने सृष्टि को कोई योगदान नहीं दिया। एक योगदान दिया जाता है और एक योगदान लिया जाता है। उन्होंने योगदान दिया नहीं है, हम सबने योगदान उनसे लिया है, प्राप्त किया है। प्रकृति ने प्राप्त किया है। पेड़ किसी को फल नहीं देगा फल हम उससे लेंगे, हमें ऑक्सीजन नहीं देगी हवाये, हम ऑक्सीजन लेंगे,

महाराज श्री ने कहा गाय हमे दूध नही देगी, हम दूध लेगे। ये सब योगदान दिया नही जा रहा है, योगदान हम लेते है। पहला तो हमे योगदान लेने की कला आना चाहिए क्योंकि महान शक्तियाँ किसी को योगदान देना ही नही चाहती क्योंकि वो अपने आप में इतने आनंद में चली जाती है कि दुनिया से बेखबर हो जाते है। शुद्धो पयोग की ऐसी दशा हो जाती है, वे तो अरिहंत भगवान है। ध्यान में बैठे हुये साधु का वर्णन मूलाचार में किया कि तीर से घायल हिरण मुनिराज की गोदी में गिर गया, त्राहि त्राहि कर रहा है, मुनिराज को खबर ही नही है कि कोई हमारी गोदी में पड़ा है। अब हमें लेना था तो हमारे आपके पुण्य ने भगवान का ऐसा परिणमन करा दिया। शब्द वर्गणायें, पुद्गल वर्गणायें जो शब्द रूप परिणित हो रही है, ये भगवान के अतिशय से नही, ये भक्तो की निमित शक्ति के चमत्कार से होती है। हमारा पुण्य पुद्गल वर्गणाओं को भगवान के पास भेज रहा है। जो बुद्धि पूर्वक बोल रहा है, जान रहा है, जिनके अनुभव में आ रहा है कि मैं देख रहा हूं जान रहा हूँ वो सर्वज्ञ की कोटि में नहीं आता। जो ना जान रहा है न अनुभव में आ रहा है उसके बाबजूद भी जो उसका कथन हो रहा है वह समीचीन हो रहा है उसको आप्त बोलते है। जो आज कल हमारे पास जो कुछ भी है सब हमारा है, हमारे लिए है लेकिन इसकी प्रमाणिकता सर्वज्ञ है, जब तक सर्वज्ञ से ये शब्द वर्गणायें स्पर्शित नही होगी वो समीचीन नही हो सकती है, शब्द तो बन सकती है, सत्य को उद्घाटित नही कर सकती। तब जब दुनिया मे उस चीज को जानने के लिए लोग आकुल- व्याकुल होते है, जो वे इन्द्रिय मन ज्ञान से नही जान पाते है ऐसी आकुलता की योग्यता जब हममें जागती है तब इस जिनवाणी का निर्माण होता है। तीन बातें जानना भगवान ज्ञेय को जानते है, ज्ञेय उनका स्व है,आत्मा है, ज्ञेय को वे जानते नही है,पर ज्ञेय उनके ज्ञान में झलकते है। दर्पण जानता नही है,दर्पण में झलकता है, वो जानते नही है, झलक रहे है उनके ज्ञान में। महावीर भगवान से अधिक योगदान आदिनाथ भगवान ने दिया क्योंकि तीर्थंकर की परंपरा से अलग हटकर के षटकर्म का उपदेश दिया। किसी भी तीर्थंकर संहिता में नही आता कि संसार बढ़ाने का उपदेश दो। किसी भी तीर्थंकर ने तलवार चलाना,खेती करना नही सिखाया लेकिन ऋषभदेव तीर्थंकर ने षट्कर्म सिखाकर इस जगत के कल्याण के लिए योगदान दिया। दूसरा गोवर्धन मुनिराज ने अपने समस्त प्रोटोकॉल छोड़कर संस्कृति की रक्षा के लिए आगे आने वाले जीवों के पुण्य के परिणाम स्वरूप स्वयं जाकर के एक बालक की एक ग्रहस्थ से याचना की, जिसको खुद से पढ़ाया, लिखाया और जगतपूज्य भद्रबाहु स्वामी बनाया।
भद्रबाहु स्वामी जी ने भी बहुत मेहनत करके यह ज्ञान अपने शिष्यों को दिया और अंत मे सबसे बड़ा योगदान परम् पूज्य धरसेन स्वामी का यदि वो ज्ञान देकर चले जाते तो हम सब विस्मित हो जाते। हमारा पास कुछ नही बचता, हम यही के यही भूल जाते कि क्या कहा और उससे भी बड़ा प्रथम योगदान पुष्पदन्त, भूतवली महाराज का। मौखिक ज्ञान को उन्होंने लिपिबद्ध करके जो अनन्त उपकार किया है,2050 वर्ष का सबसे बड़ा योगदान उनका है।


इस अवसर पर श्री दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति के पदाधिकारियों ने राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी में बाहर से आये हुए विद्वान का दुपट्टा एवं माला पहनकर स्वागत सम्मान किया| मीडिया प्रभारी शुभम जैन ने बताया कि मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ससंघ के मंगल सान्निध्य में त्रिवदिवसीय राष्ट्रीय विद्वत संगोष्ठी अखिल भारतीय दिगम्बर जैन विद्वत परिषद का खुला अधिवेशन 10 अक्टूबर तक चलेगा।जिसके अन्तर्गत महान विद्वान अपने आलेख और विचारों के माध्यम से समाज के कल्याण हेतु संगोष्ठी करेंगें।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया5 रामगंजमंडी
