मान के अतिरेक का शमन कर मृदुता धारण करना ही उत्तम मार्दव धर्म है*

धर्म

मान के अतिरेक का शमन कर मृदुता धारण करना ही उत्तम मार्दव धर्म है
जैन धर्म के अनुसार दश लक्षण पर्व में प्रत्येक दिवस एक धर्म विशेष की पूजा अर्चना की जाती है जिसमें प्रथम दिवस उत्तम क्षमा तो द्वितीय दिवस उत्तम मार्दव धर्म की आराधना की जाती है। मृदुता को समझने से पूर्व सूक्ष्म रूप से मान को समझते हैं। मान का साधारण सा अर्थ किसी भी वस्तु के माप या उसके वजन से लगाया जाता है जैसे किसी वस्तु का मान दो किलोग्राम है यह एक सामान्य सा अर्थ है। यदि व्यक्ति विशेष के बारे में मान का अर्थ लगाए तो मान के पर्यायवाची शब्द गौरव, प्रतिष्ठा, सम्मान, इज्जत, मर्यादा, यश आदि को देखना होगा। अर्थात मान का अर्थ स्वयं की प्रतिष्ठा से है जो आसपास के वातावरण या समाज मे आपको प्राप्त होती है। लेकिन जब मान का अतिरेक बढ़ता है तो वह स्वतः ही अभिमान या अहम में परिवर्तित हो जाता है और वही व्यक्ति के पतन का कारण भी होता है। दशलक्षण धर्म के अंतर्गत द्वितीय दिवस का धर्म उत्तम मार्दव भी इसी और इंगित करता है। कि आपको अपने मान जो कि अभिमान में परिवर्तित हो चुका है का शमन करते हुए मृदुता को धारण करना है अर्थात स्वयं के अहम को मर्दन करना ही मार्दव धर्म है।


वर्तमान युग में सबसे कठिन कार्य यही है कि व्यक्ति अपने मान का शमन नहीं कर सकता अपितु मान को बढ़ाने के लिए जितने भी कार्य हो सकते हैं उन सबको करता है जिसे सामान्य सी बोलचाल में मान बढ़ाई कहा जाता है। मान का वास्तविक अर्थ यदि जान ले तो फिर वह अभिमान की ओर ना बढ़कर कोमलता की ओर अग्रसर होगा।

 

 

 

इसे दूसरी तरह से देखे तो *मान के अनुरूप सम्मान यानी मान के सम प्राप्त होने पर अभिमान की ओर प्रशस्त होना या सम्मान का मान रखते हुए समता,कोमलता की ओर बढ़ना*

 

दोनों ही परिस्थितियों पर मंथन किया जाए तो विवेक पूर्ण निर्णय निकल कर आ सकता है जिसके परिणाम भी सुखद होंगे।
संजय जैन बड़जात्या कामां

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