विद्याधर से विद्यासागर पुस्तक पढ़ने के बाद वैराग्य जागा निर्लोभ सागर महाराज
सागर
पूज्य मुनिश्री 108 निर्लोभ सागर जी महाराज ने अपने दीक्षा दिवस पर अपने संस्मरण को सभी को बताया
उन्होंने कहा कि युवा अवस्था में अपने जन्म स्थान तारादेही में पिताजी के साथ बैलगाड़ी में एक बीमार गाय को लेने जंगल में जा रहा था, अचानक बादल गरजे और बिजली मेरे सामने गिर गई। और मैं मूर्छित हो गया। 36 घंटे मूर्छित और 1 साल तक बीमार रहा।
उन्होंने बताया कि सन 1986 में आचार्य श्री ललितपुर में थे तभी से मेरे मन में दीक्षा की इच्छा हुई। विद्याधर से विद्यासागर पुस्तक पढ़ने के बाद मेरे मन में आया कि जैसा गुरुजी ने किया वैसा ही मैं करूंगा। पंडित पन्नालाल साहित्याचार्य गुरुकुल में हमें पढ़ाया गया।

कई बार हम दीक्षा लेने के लिए गुरुदेव के चरणों में पहुंचे लेकिन गुरुदेव का कहना था कि पंडित जी बोलेंगे तब दीक्षा मिलेगी। तभी अचानक 2013 में रामटेक से फोन आया कि गुरुदेव ने बुलाया है तैयारी करके आना है कोलकाता से हवाई जहाज से नागपुर जाने के लिए व्यवस्था हुई डेढ़ घंटे में नागपुर और नागपुर से सीधा रामटेक गुरु के समक्ष पहुंचा तो गुरुदेव ने सीधा केशलोच का आशीर्वाद दिया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
