शोक को नशाने वाली अशोक नगरी में हर्षित होकर रहे–आर्जव सागर महाराज

धर्म

शोक को नशाने वाली अशोक नगरी में हर्षित होकर रहे–आर्जव सागर महाराज

अशोक नगर–
सुभाषगंज मैदान में धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए आचार्य श्री आर्जवसागर महाराज ने कहा
हम सब लोग शोक को नशाने वाली अशोक की नगरी में बैठकर जिंदगी को आनंदित बनाने के लिए कुछ सीखने समझने चाहते हैं तो चिंत की चंचलता को रोकें।इन्द्रभूति गौतम गणधर ने भगवान महावीर स्वामी की वाणी को सुनकर अपने चित की चंचलता को रोक दिया
उन्होंने प्रभु की वाणी को सुनकर संसार के प्राणियों के कल्याण के लिए तीर्थकर प्रभु की देशना को जन जन पहुंचा दिया। जिससे तीर्थ उदित होता है, जो संसार सागर से पार लगाए वे तीर्थ कहलाते हैं।

 

 

 

उन्होंने कहा कि कुंआ किसी एक व्यक्ति का नहीं होता एक समाज का नहीं होता जो चाहे वह कुआ के पास पहुंच कर पानी पी सकता है हम साधुओं का जीवन कुंआ के समान होता है जो चाहे आकर पानी पी सकता है जितना लेना चाहते हो लोटा भर गांगर भर लो चाहे कोई समाज का हो सभी तो सब के होते हैं साधु तेरे मेरे चक्कर में नहीं पड़ते उनके कुछ आवश्यक होते हैं उन्हें छोड़ कर आप सभी नगर वासी लाभ ले सकते हैं चाहे वे कोई धर्म पंथ के हो ।

आचार्य श्री ने कहा कि स्वयं अपने द्वारा किए कर्म का फल हमे मिलता है भगवान हमारे जीवन में आइना के समान है जैसे आइना कुछ नहीं करता आपका चेहरा जैसा होगा वैसा ही आइना बता देता है ऐसे ही भगवान कुछ नहीं करते हम उनके आईने में अपने जीवन को झांक लेते हैं भगवान की प्रशांत मुद्रा को देख कर अपने कर्मो की निर्जरा कर सकते हैं हमें अपने कर्म का फल भोगना पड़ता है कभी पाप और पुण्य एक साथ आता है जो हमने पूर्व में किया है वहीं भाग्य बनकर हमारे सामने आता है ईश्वर तो परम दयालु हैं कृपालु है।

आचार्य श्री ने कहा कि भगवान तो कृपालु है ईश्वर तो परम दयालु हैं कृपालु है वह किसी को सुखी और किसी को दुखी कैसे बना सकता है ये सभ्यता है कि जब कुछ अच्छा होता है तो हम इसे ईश्वर की कृपा मानकर उनका धन्यवाद करते हैं आभार करते हैं हमें पुण्य का प्रताप दिखने में भी तो आ रहा है एक व्यक्ति हलो हलो कर रहा है और तिजोरी भरी जा रही है और वही दूसरा व्यक्ति पूरे दिन मेहनत करके दो दून की रोटी खा पा रहा है ये सब हमारे ही पूर्व में किए गए कर्मो का फल है आज जो अच्छा करेगा वही कल उसके भाग्य वनकर आने वाला है उन्होंने कहा कि तत्व के ज्ञान को समझने के लिए विद्वान की आवश्यकता भी होती है विद्वान अपनी कुशलता से आपको समझा सकता है बिना विद्वान के ज्ञान नहीं मिलता वैसे ही बिना अग्नि के बिना रोटी नहीं सिक सकती अग्नि आपको मिल गई है आप चाहें तो अपनी रोटी सेंक सकते हैं गुरु महाराज रूपी अग्नि गर्म है उसमें आप अपनी भी रोटी सेक ले। सभा का संचालन जैन युवा वर्ग संरक्षण शैलेन्द्र श्रागर ने किया।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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