प्रतिमा को साक्षात भगवान मानकर भक्ति करने से पाप का नाश होता है पुण्य में वृद्धि होती है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
आयड
जो धर्म का श्रवण करते हैं वह भव्य जीव होते हैं धर्म का श्रवण करने के लिए उदयपुर के विभिन्न उप नगरों से श्रद्धालु पधारे हैं संक्रांति का अर्थ परिवर्तन होता है बहुत वर्षों की प्रतीक्षा के बाद प्रार्थना सुनकर लक्ष्य बनाकर संघ का बिहार उदयपुर के लिए हुआ है यह मंगल देशना वात्सल्य वारिघि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने आयड उदयपुर की धर्म सभा में प्रकट किए
आचार्य श्री ने आगे बताया
कि सन 2002 में चातुर्मास के लिए उदयपुर आए थे सेक्टर 11 में भी पंचकल्याणक प्रतिष्ठा थी गर्मी का उपाय श्रावक लोग एसी कूलर से करते हैं किंतु संघ का गर्मी में बिहार हुआ । प्राणी सुख का अभिलाषी है अनेक प्रयास करते हैं किंतु धर्म से ही सुख की प्राप्ति होगी ,धर्म ही सबसे बड़ा साधन है प्राणी जो सुख चाहते हैं चाहे वह लौकिक सुख हो या धार्मिक सुख हो, रत्नत्रय रूपी धर्म से सुख प्राप्त होगा।
संसार में सुख नहीं है आप दुखी हैं आपको दुखी देखकर हमने भी कम उम्र में दीक्षा ली है जिन्होंने शाश्वत सुख प्राप्त किया है वह रत्नत्रय धर्म से प्राप्त किया है। पर्यूषण पर्व वर्ष में तीन बार आते हैं।माघ चेत्र और भादो भादव में धर्म की आराधना का पर्व पर्यूषण पर्व एवं अष्टांहिका महापर्व है यह अनादि काल के पर्व है पर्व जीवन में परिवर्तन लाते हैं परिवर्तन कैसे आवे इसके लिए भक्ति करो वितराग भगवान की भक्ति स्तुति करने से जीवन में परिवर्तन आवेगा ।आचार्य श्री आगे बताते हैं की भक्ति भगवान की कैसे करना चाहिए भगवान के गुणों का स्तुति भक्ति कर अनंत गुणों का जाप करना चाहिए भगवान वीतरागी है ,सर्वज्ञ हैं ,और हितोपदेशी हैं ।ऐसे अनेक गुण हैं प्रतिमा धातु की या पाषाण की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा भगवान के गुणों की की जाती है इसलिए प्रतिमा को साक्षात भगवान मान करी भक्ति करें इससे पाप का नाश होगा और पुण्य में वृद्धि होगी।
भक्ति अभिषेक पूजन विनय द्वारा होती है भगवान का अभिषेक आप केवल मस्तक पर करते हैं जबकि भगवान का अभिषेक सर्वांग होना चाहिए प्रतिमा के प्रति विनय भाव होना चाहिए अविनय से गुणों की विराधना होती है ।आप श्रावक लोग भगवान के अभिषेक के बाद अभिषेक के जल का प्रक्षालन करने के लिए प्रतिमा को तिरछी करते हैं उल्टी करते हैं,प्रतिमा से कलश टकरा जाता है या आपके कपड़े छूते हैं ।यह भगवान के प्रति अविनय है इन दोषों को दूर करने के लिए शांति धारा की जाती है ।शांति धारा के बीज मंत्रों से भगवान के प्रति हुए अविनय दूर होकर गुणों की स्थापना होती है।

पारस चितोड़ा राजेश पंचोलिया ने बताया कि इसके पूर्व संघस्थ शिष्या आर्यिका श्री महायशमति माताजी ने अपने उद्बोधन में णमोकार मंत्र का महत्व बताया ।जीवन में आमूलचूल परिवर्तन गुरु के उपदेश से होता है ।णमोकार मंत्र मंगल मंत्र है इसी से अन्य मंत्रों की उत्पत्ति होती है यह षटखडागम का प्रथम सूत्र है। णमोकार मंत्र मंगल स्वरूप है सब विघ्न दूर होते हैं कर्मों की निर्जरा होती है। णमोकार मंत्र का भाव पूर्वक शुद्ध उच्चारण करने से पापों का नाश होता है और पुण्य में वृद्धि होती है सब जन्म जरा के दुख से दुखी हैं ।सुख चाहते हैं तो भाव पूर्वक प्रभु की भक्ति करें स्तुति करें ।आर्यिका श्री महायश मति जी ने अनेक उदाहरण से बताया कि बैल को मरते समय णमोकार मंत्र सुनाने से वह वृषभ ध्वज राज पुत्र के रूप में उसने जन्म लिया श्रद्धा विश्वास के साथ णमोकार मंत्र का जाप करने से पुण्य का उदय होता है सभी को नियम संयम धारण करना चाहिए छोटा सा नियम जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन लाता है।

आचार्य श्री शांति सागर जी की चातुर्मास स्थली आयड उदयपुर में आयोजित धर्म सभा में आचार्य श्री शांति सागर जी के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन कमेटी एवम् अप नगरों से पधारे समाज जन ने किया। मंगलाचरण श्रीमती इंदू अजमेरा ने किया कार्यक्रम का सुंदर संचालन पवन चितोड़ा ने किया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
