भगवान आदिनाथ को इस युग के निर्माता के रूप में जाना जाता है आचार्य विशुद्ध सागर महाराज

धर्म

भगवान आदिनाथ को इस युग के निर्माता के रूप में जाना जाता है आचार्य विशुद्ध सागर महाराज

आहारजी

पूज्य आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज ने आहार जी में चल रहे पंचकल्याणक महोत्सव में तब कल्याणक की बेला में भगवान आदिनाथ के जीवन पर प्रकाश डाला

 

 

उन्होंने कहा भगवान आदिनाथ ने ही पहली बार नियम-सिद्धांत, अधिकार की स्थापना की थी। विस्तृत रूप में भगवान आदिनाथ के जीवन कृतित्व पर आचार्य श्री ने कहा कि भगवान आदिनाथ को जैन धर्म के संस्थापक एवम प्रथम तीर्थकर है।इनका जन्म भारतभूमि में हुआ था। इनको ऋषभदेव तथा वृषभदेव के नाम से भी जाना जाता है।

उन्होंने बताया की जैन धर्म की पवित्र पुस्तक आदि पुराण में इनकाविस्तृत रूप से उल्लेख मिलता है,जैसे कि इनका जन्म, तपस्या, कैवल्य ज्ञान तथा मोक्ष प्राप्ति सभी का वर्णन

 

उन्होंने कहा कि भगवानआदिनाथ को इस युग के निर्माता के रूप में जाना जाता है। इनसेपहले मनुष्य कोई काम नहीं करते थे, अर्थात पढ़ना-लिखना, खेती, व्यापार करके उन्नति करना और और पैसे कमाना, अपनी या अपने परिवार या देश की रक्षा करना तथा इन सभी कोलिपिबद्ध करना इत्यादि सिखाया।

 

इस तरह से मनुष्य को मूलभूत चीजों को सिखाने का श्रेय भगवानआदिनाथ को जाता है।पूज्य श्री ने बताया की भगवान आदिनाथ के पूर्व व्यापार इत्यादि किसी भी चीज का प्रावधान नहीं था।जैन मान्यता के अनुसार उस समय तक मनुष्य की सभी आवश्यकताएं कल्पवृक्ष से पूरी हो जाया करती थी, लेकिन धीरे-धीरे कल्पवृक्ष की शक्तियां कम होती गई। इसके बाद भगवानआदिनाथ ने ही मनुष्य को सब ज्ञान दिया। साथ ही मनुष्य को जीवन जीने के लिए छह काम सिखाए ।आचार्यश्री ने कहा कि तात्पर्य यहहै कि भगवान आदिनाथ ने ही लोगोंको सुनियोजित तरीके से भवननिर्माण करना, नगर बसाना, खेतीकरके अन्न उगाना और उससेभोजन करना, शिक्षा प्राप्त करनाऔर उससे समाज में नियमों कीजैन धर्म के अनुसार उन्होंने हीप्रथम बार अपनी नगरी अयोध्या मेंशासन-व्यवस्था, नियम-सिद्धांतअधिकार- कर्तव्य इत्यादि कीस्थापना की थी। इसके बाद सबकुछ नियमों के अनुसार चलने लगाथा तथा धर्म की स्थापना हुई थी।

तपकल्याण की क्रियाएं हुई

दोपहर के बाद कार्यक्रमों में तपकल्याणक की क्रियाएं पूरी की गईं।सबसे पहले राजा नाभिराय का दरबारलगाया गया। जिसमें महाराज नाभीराय एवं मां मारू देवी की इच्छाअनुसार युवराज आदि कुमार काविवाह कराने की इच्छा व्यक्त की गईजिसे सहर्ष स्वीकार करते हुए युवराजआदि को मां ने विवाह की अनुमतिप्रदान की। कई राजाओं महाराजाओंऔर अयोध्या नगरी की प्रजा सैनिकोंके साथ मिलकर युवराज आदि कुमारकी बारात निकाली गई। उनका विवाहनंदा और सुनंदा नाम की राजकुमारियों के साथ हुआ। अयोध्या नगरी वापसआने के बाद कई साल जब व्यतीतहुए, तब महाराज नाभी राय के द्वारायुवराज आदि कुमार को अयोध्या केराज्य का राजा घोषित किया गया।राजा के ऋषि के बताए मुहूर्त केअनुसार उनके राजतिलक पर उन्हेंअयोध्या नगरी का महाराज बनायागया। इस पावन अवसर पर 32000राजाओं के द्वारा अयोध्या नगरी के नएमहाराज आदि कुमार को उपहार भेंटकिए गए। साथ ही उन्हें बधाइयां दीगईं। कई सालों तक तक राजपाटसंभालने के बाद सौधर्म इंद्र द्वारामहाराज आदि कुमार के दरबार मेंनीलांजना के नृत्य को दिखाया गया।नृत्य करते हुए एक नीलांजना की मृत्यु हो जाती है, जोकि स्वर्ग की देवी होतीहै, तभी सौधर्म इंद्र अपनी माया विद्यासे दूसरी नीलांजना को प्रकट कर देताहै। जिससे सभा में उपस्थित किसीभी महानुभाव को यह मालूम ही नहींलगता कि पहली नीलांजना की मृत्युहो गई, जबकि महाराज आदि कुमारअवधि ज्ञानी थे, उन्हें यह आभास होजाता है और वह नृत्य को विरामकरने के लिए कहते हैं। इस दृश्य कोदेखकर वह मन में विचार करते हैं किजब यह नीलांजना मृत्यु को प्राप्त हो गई। ऐसे ही एक दिन हमारा जीवन भी नष्ट  हो जाएगा। हमें भी मृत्यु को प्राप्तकरना है और उन्हें वैराग्य हो जाता है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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