प्रशांत सागर महाराज के अंदर परिणामों की विशुद्ध थी। गुणमति माताजी
सागर
पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर अंकुर कॉलोनी में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 प्रशांतसागर महाराज के प्रति विनयांजली दी गई।इस अवसर पर आर्यिका 105 गुणमति माताजी ने अपने भाव व विनयांजली प्रकट करते हुए कहा कि समाधि साधना की अंतिम उपलब्धि है। मौत उसकी जिसका जमाना करे अफसोस। उन्होंने कहा यूं तो सभी आए हैं मरने के लिए मानसिक विकार की आधि शारीरिक विकार को व्याधि कहते हैं। एवं बुद्धि के विकार को उपाधि कहते हैं। मन का रोग आधि है, तन का रोग व्याधि है। धन का रोग उपाधि है। और इन सभी रोगों की दवा समाधि है।
पूज्य माता जी ने समाधि के विषय में कहा कि समाधि कोई ऐसा गिफ्ट आइटम नहीं है, जो विशेष प्रसंग पर उपहार स्वरूप दिया जा सके। यह तो साधक की नितांत परिपक्व होने की दशा मानी जाती है।पूज्य प्रशांत सागर महाराज के विषय में बोलते हुए माताजी ने कहा कि वह हृदय रोग से पीड़ित थे और वह प्रति क्षण सजग रहते थे।


साधक जब से अपनी जिंदगी में व्रतों को ग्रहण करता है उस समय से उसका लक्ष्य समाधि का हुआ करता है। प्रशांत सागर महाराज के अंदर परिणामों की विशुद्ध थी। वह सिद्धांत के धनी थे, उनका हर समय सिद्धांत की तत्व चर्चा में ही निकलता था। इस अवसर पर संघस्थ माताजी ने भी अपनी विनयाजली प्रकट की। आर्यिका आत्ममति माताजी ने कहां की मुनि श्री मैं पाठशाला का पुनरुद्धार उत्कृष्ट तरीके से किया।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
