जो विनय करता है वो साक्षात तीर्थकर की आज्ञा का पालन करता है कनकनंदी
भीलूडा
परम समता धारी वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि जो विनय करता है वह साक्षात तीर्थंकर की आज्ञा का पालन करता है। ऋतु के अनुसार साधु की सेवा वैयावृत्ति करना शीतकाल मे उष्ण क्रिया, ग्रीष्म ऋतु में शीत क्रिया से करना चाहिए। शरीर से अधिक तापमान या कम तापमान होने पर शरीर उसे सहन नहीं कर पाता है जिससे ब्लड सरकुलेशन नहीं हो पाता है जिससे अनेक रोग होते हैं, नींद नहीं आती है। अधिक ठंड से अनेक पशु भी मर जाते हैं। अधिक विहार करने पर 80 परसेंट ऊर्जा नष्ट होती है जिससे ध्यान अध्ययन में उर्जा नहीं रहती हैं। ऋतु के अनुकूल, प्रकृति के अनुकूल आहार देना, आदेश पालन करना, चटाई पाटा लगाने आदि सभी प्रकार की व्यवस्था करना भी विनय है। पुस्तक, कमंडल, शास्त्र, रूम आदि का परिमार्जन करना कायिक विनय हैं। पूजनीय वचन बोलना, बहूमान से बोलना, हितकर बोलना, मीत वचन बोलना, मधुर वचन बोलना आदि वाचनिक विनय है। निष्ठुर हल्का कर्कश वचन नहीं बोलना चाहिए। धर्म के कारण भूत जो आत्मा को परमात्मा बनाये वह हित वचन हैं। आत्मउत्थान करने वाले मीत वचन बोलना चाहिए। कानों को सुखदाई लगने वाले वचन बोलना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा पहले स्वयं शीतल बनो फिर अन्य को शीतल बनाओ। आचार्य श्री अंदर से शीतल नरम होने के कारण उनके कड़क वचन भी शिष्यों के हित के लिए होने के कारण मीठे लगते हैं। सार्वभौम आत्म हितकारी वचन बोलना चाहिए। जिससे पंथ भेद मतभेद विवाद नहीं हो ऐसे वचन बोलने चाहिए।
विजय लक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
