अतिशय क्षेत्र कैथूली क्षेत्र परिचय
कैथूली गांव प्रकृति की सुरम्य छटाओं में प्राकृतिक सौन्दर्य से ओतप्रोत एवं पहाड़ों की तलहटी में बसा एक छोटा सा ग्राम है, यहां केवल मात्र एक ही जैन परिवार निवास करता है । यह क्षेत्र प्राकृतिक सुषमा के मंदिर का द्वार बीच नगरीय चहल-पहल से दूर एकान्त में स्थित धार्मिक साधना केन्द्र है। वही प्राकृतिक प्रेमियों का आकर्षण का स्थल भी है। इस क्षेत्र का निर्माण मालवा देश के महाराज श्री राव | दुर्गा के राज्य रायपुर के ग्राम कैथूली में बघेरवाल जैन जाति के धानोतिया गोत्र के साह कंवलसी के परिवार द्वारा कराया गया था। उस समय चंद्रावत रियासत की रानी चंद्रावती जिनका महल मंदिर के पीछे स्थित था, वे प्रतिदिन जिनालय में गुफा मार्ग से मंदिर में जिनबिम्बों के दर्शनार्थ आती थी, वह गुफा आज भी मंदिर के उत्तर में स्थित है। यहां के जिन बिम्बों में मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ जी की पाषाण की अतिशय युक्त प्रतिमा 400 वर्ष पुरानी है, एवं पीतराज की दो चौबीसी है, जिसमें एक पर सम्वत् 753 अंकित है। मूलनायक वेदी के बाहर वाली वेदी पर दोनों और विराजमान भगवान आदिनाथ जी की चतुर्थकालीन प्रतिमायें विद्यमान है,

मंदिर जी के मुख्य द्वारों पर खजुराहा शैली की स्थापत्य कला के नमूने मौजूद है। पुरातत्व अतिशय के साथ-साथ मूलनायक प्रतिमा से जलधारा जिन वेदियों पर केसर के छीटे पड़ना, छत्रों का अपने आप हिलना गंधोधक का केसरिया होना एवं आरती के समय नागराज का आना इस क्षेत्र के अतिशय को स्वयं प्रदर्शित करता है । यह क्षेत्र दिल्ली-मुम्बई रेल मार्ग पर स्थित रामगंजमंडी रेल्वे स्टेशन से खैराबाद-गोयन्दा होते हुए 15 किलोमीटर दूर सुगम सड़क मार्ग है, रामगंजमंडी से वाया रावली-मंडा सनखेड़ा होते हुए ढ़ाबला से कैथूली 18 किलोमीटर एवं रामगंजमंडी से संधारा होकर सानड़ा ढ़ाबला होते हुए 25 किलोमीटर दूर है। तथा भानपुरा (मध्यप्रदेश) से प्रतिदिन नियमित बस सेवा भी उपलब्ध है । इस जिनालय का निर्माण संवत 1653 सन 1597 में कराया गया है।

बघेरवाल जाति के श्रेष्ठ श्री देदा एवं श्री धनराज धानोत्या ने इस मन्दिर की प्रतिष्ठा कराई थी। मन्दिर जी में चतुर्शकालीन प्रतिमाऐं भी विराजमान है। मुख्यद्वार पर खजुराहो शैली में निर्मित स्थापत्य के बेजोड़ नमूने है। इस अतिशय क्षेत्र मन्दिर के पीछे चन्द्रावत रियासत की रानी चन्द्रावती का महल भी स्थित था। मान्यता है कि रानी गुफा मार्ग से प्रतिदिन मन्दिर के जिनबिम्बों के दर्शन करने आती थी। साक्ष्य के रूप में आज भी मन्दिर के उत्तर में वह गुफा स्थित है। अतिशय : मूलनायक प्रतिमा से जलधारा होना, वेदियों पर केशर के छीटेंपड़ना, छत्रों का खुद हिलना गंधोदक का केसरिया होना एवं आरती के समयनागराज का आना ऐसी मान्यता यहां प्रचलित है। मन्दिर जी में चार शिलालेख विराजमान है। जिससे मन्दिरकी निर्माण आदि जानकारी प्राप्त होती है।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी
