अंकलिकर परम्परा में मूलाचार नुसार पंचाधार स्थापना के आज 50 वर्ष पूर्ण-

धर्म

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*अंकलिकर परम्परा में मूलाचार नुसार पंचाधार स्थापना के आज 50 वर्ष पूर्ण-*

हमारी वर्तमान की तीन पवित्र पूज्य श्रमण परम्पराओ में से आचार्य देव श्री आदिसागर जी अंकलिकर स्वामी की महान गौरवशाली श्रमण परम्परा में द्वितीय पट्टाचार्य तीर्थभक्त शिरोमणि श्री महावीरकीर्ति जी ऋषिराज ने आज से ठीक 50 वर्ष पूर्व माघकृष्ण तृतीया अर्थात 3 जनवरी 1972 को अपनी समाधि को अत्यंत निकट जानकर समस्त संघ को अपने पास बुलाकर सबके समक्ष मूलाचार नुसार संघ के पंचाधार की स्थापना की।
जिसमे तपस्वी सम्राट सन्मतिसागर जी को अपना आचार्य पद ,अंकलिकर परम्परा का तृतीय पट्टाचार्य व उपाध्याय का कार्यभार भी उन्ही को दिया,मुनि श्री कुंथुसागर जी को गणधर,मुनि श्री सम्भवसागर जी को स्थिवर, मुनि श्री नेमिसागर जी को प्रवर्तक व आर्यिका श्री विजयमती जी को प्रथम गणिनी पद पर अलंकृत करते हुए कहा कि
परस्पर पूरक बनकर धर्म की प्रभावना करना,आगमानुसार चर्या का पालन करना,राग-द्वेषादि प्रपंचो से बचना व जैन धर्म की हानि हो ऐसा कोई भी कार्य नही करना इस तरह सम्बोधित कर आचार्य श्री महावीरकीर्ति जी भगवन्त आहार-उपाधि सबका त्याग कर समाधि साधना में आरूढ़ हो गए।
*आचार्य भगवन्त श्री महावीरकीर्ति जी सहित चतुर्विध संघ की जय*

*????️शब्दसुमन-शाह मधोक जैन चितरी????️*
*नमनकर्ता-श्री सुनीलसागर युवासंघ भारत*
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