हमें जीवन में गलतियों को सुधार कर बैर भाव मिटाना चाहिए आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज

धर्म

हमें जीवन में गलतियों को सुधार कर बैर भाव मिटाना चाहिए आचार्य  श्री वर्धमान सागर महाराज
बोली
आज का दिन भगवान पार्श्वनाथ तथा भगवान श्री चंद्र प्रभु का जन्म और तप कल्याणक का दिवस है । भगवान पारसनाथ का जीव हाथी की पर्याय से अनेक भव में भ्रमण करते हुए मनुष्य पर्याय में पारसनाथ भगवान की पर्याय को धारण कर अनेक भवों के कर्म बंधनों से मुक्त होकर तीर्थंकर भगवान बने।

 

यह मंगल देशना वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने भगवान श्री पार्श्व नाथ भगवान के जन्म एवम् तप कल्याणक दिवस के अवसर पर बोली नगर की धर्म सभा में प्रकट किए।

 

 

 

 

आचार्य श्री ने आगे प्रवचन में बताया कि आपके नगर के मूलनायक भगवान भी श्री पारसनाथ भगवान है। पारसनाथ भगवान और कमठ के जीव के का बेर वर्षों तक ही नहीं बल्कि अनेक भवों में भ्रमण का एक कारण बना।कमठ के जीव ने वर्षों तक कई भव तक बेर रखा और खुद का कल्याण नहीं किया इससे यह शिक्षा लेना चाहिए कि हमें जीवन में गलतियों को सुधार कर बैर भाव मिटाना चाहिए।

 

श्री गजू भैया एवम् राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने आगे कहा कि संसार के प्रत्येक प्राणी को 12 भावनाओं का चिंतन करना चाहिए वैराग्य भावना को समझने की जरूरत है संसार का प्राणी अनेक भव में भ्रमण कर रहा है, आपका नगर बोली एक नगर है इसके आसपास पर्वत और किला है किला शत्रु से रक्षा करता है राजा भी प्रजा की रक्षा करते हैं, पर्वत यह संदेश दे रहे हैं कि इससे रक्षा होती है किंतु आप रक्षित नहीं है, कारण यही है कि हमारी रक्षा केवल धर्म करता है हाथी की पर्याय से मनुष्य पर यह धारण करने के बाद उन्होंने तिर्यंच पर्याय को धारण नहीं किया ,इस पर्याय के बाद उन्होंने तीर्थंकर प्रकृति का बंध किया ,16 भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति का बंघ हुआ ।संसार में आप परिभ्रमण कर रहे हैं तीर्थंकरों ने भी अपने पूर्व अनेक भव में संसार में परिभ्रमण किया है।

 

पंचकल्याणक के दृश्य देखते हैं और आप भूल जाते हैं कोई भी भावना भव से पार करा देती है पंचकल्याणक के दृश्य देखकर आपकी यही भावना होना चाहिए कि हम भी संसार से जल्द मुक्त हो जब तक आत्मा के में संसार के कर्मों का नाश करने की भावना नहीं होगी तब तक आप संसार में परिभ्रमण करते रहेंगे।

कोई भी मानव घर से या तो खड़े होकर निकलते हैं या आडे होकर निकलते हैं इसका आशय यह है कि दीक्षा खड़े होकर ली जाती है और सामान्य व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसे लेटा कर घर से निकाला जाता है ।आपकी आत्मा में कर्मों का आश्रय , बंघ और संवर हो रहा है दीक्षा के माध्यम से आप कर्मों का नाश कर सकते हैं तपस्या के माध्यम से कर्मों की निर्जरा होती है ,आप श्रावक धर्म का पालन करें जीवन में आत्मा की रक्षा के लिए धर्म ही एक साधन है ,धर्म किला है, जिससे बाहरी शत्रुओं से हम आत्मा की रक्षा कर सकते हैं।
वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री के
प्रवचन के पूर्व कार्यक्रम में 1008 श्री पारसनाथ भगवान का अभिषेक हुआ।प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवती आचार्य श्री शांति सागर महाराज एवम् 108 वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर के चित्रों का अनावरण श्रीमती तारा सेठी ,श्री सुनील धरियावद,राजेश पंचोलिया इंदौर,श्रीमती लता भोपावत ,श्री सुमति लाल जी ने किया।
श्रीमती तारा सेठी ने भजन प्रस्तुत किया।नित्य नियम पूजन प्रारंभ के बाद
श्री पार्श्व नाथ भगवान की पूजन भक्ति भाव नृत्य पूर्वक की गई।
मंडल विधान की पूजन के बाद
पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की पूजन विशेष द्रव्यों से भक्ति भाव पूर्वक की गई
इस अवसर पर भगवान के जन्म कल्याणक पर बालक का पालना
सर्व प्रथम झूलाने का सौभाग्य श्री सुरेश, श्रीअनिल , श्री अशोक श्री राजमल जैन परिवार को प्राप्त हुआ कार्यक्रम का सुंदर एवम् प्रभावी संचालन श्री कमल बाबू जयपुर द्वारा किया गया।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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