मानव आहार : शाकाहार आचार्य श्री विशुद्धसागर महाराज
बड़ौत (उ.प्र.)
आचार्य श्री 108विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्म-सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि – ” सत्य जीवन जीना है तो कम-से-कम वार्ता करो। साधु-पुरुष व्यर्थ का वार्तालाप नहीं करते हैं।
जीवन में उत्कृष्टता प्राप्त करना है, तो संयमपूर्ण जीवन प्रारम्भ करो। राग-द्वेष-मोह आत्मिक- सुख में विघ्नकारी है। ज्ञानी जीवन वैराग्य के साथ जीता है। स्वस्थ,सुन्दर, सुखद जिंदगी के लिए शाकाहार ही मानव के लिए सर्वश्रेष्ठ आहार है। पौष्ठिक, संतुलित आहार ही औषधि है। शाकाहार ही मानव- आहार है। शाकाहार मानव जीवन के अनुकूल होता है। अभक्ष्य- आहार विष के समान अहितकारी एवं बीमारियों को प्रदान करने वाला होता है। भोजन, भेष एवं भाषा का भावों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जैसा भोजन होगा, वैसा ही भाव होगा और जैसा पानी पियोगे वैसी ही वाणी होगी। भोजन से मानव के कुल की पहचान होती है।

महाराज श्री ने कहा जिसका भोजन पवित्र होगा, वही प्रभु-भक्ति का फल प्राप्त कर सकता है। राष्ट्र में जितने भी आज तक महापुरुष हुए हैं, वे सभी शाकाहारी ही थे। शाकाहारी की प्रज्ञा बलिष्ट होती है। अपने मस्तिष्क को स्वस्थ रखना चाहते हो, तो हमेशा दिन में ही भोजन करो और वह भी शाकाहारी। सोच की सुचिता शाकाहार से ही संभव है। शाकाहार ही उत्तम- आहार होता है।

अहिंसा धर्म ही सर्व श्रेष्ठ है। मांसाहार महा-अनर्थ -कारी, भयंकर बीमारियों की जड़ होता है। मांसाहार प्रकृति विरुद्ध हिंसक है। जीवों को पीड़ित करके, उनके प्राणों का बधकरके मांसाहार तैयार होता है, जो मानव के लिए अनिवहै, अमंगलभूत है। मूक पशु-पक्षियों का वध करोगे, तो तुम्हे भव-भव में भटकना पड़ेगा।
अहिंसा ही धर्म का द्वार है। शाकाहार वैज्ञानिक- दृष्टि से मानवाहार है। हजारों यज्ञ-हवन करने से अधिक-श्रेष्ठ एक जीव की रक्षा करना है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
