गुरु पद पराधीन होता है गुरु पद भक्त बनाता है सुधासागर महाराज
बासी
निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव सुधासागर महाराज ने प्रवचन मे कहा गुरु पद पराधीन होता है, गुरु पद भक्त बनाता है। कोई साधु के पास हम गये साधु से पूछा आप गुरु है, साधु ने मना कर दिया कि मे गुरू नही साधु हु। तभी उन साधु को अपना गुरु मान लेना वह साधु गुरु बनने लायक हैं।
महाराज श्री ने कहा कि भगवान जब दीक्षा लेते हैं तो वह गुरु नहीं बनते हैं, वह तपस्वी बनते हैं। गुरु भक्त बनाता है। जब वह किसी परोपकार करते हैं तब वह गुरु बनते हैं। गुरु पद पराधीन होता है। साधु को अरिहंत बनना है, भगवान नहीं। भगवान का पद भक्त बनाएगा।साधु को आहार कराना है। इसके लिए चौका लगाना है। ये साधु को भिखारी बनाना है। साधु का आहार हमारे घर में कराकर अपने को सोभाग्यशाली बनाना है।अपने घर पर साधु के चरण पढ़ने से अपने को व घर को धन्य करना हैं।
प्रकृति के विषय में बोलते हुए मुनि श्री ने कहा कि प्रकृति ने अपने स्वरूप में रहने का निर्णय किया, भगवान भी चाहते कि मेरे अधीन नही रहे, वे चाहते है कि तुम भी एक दिन मेरे समान भगवान बन जाओ। ये बात जैन दर्शन के अलावा कोई भी दर्शन ने अपने समान बनाने को नहीं कहा है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
