*विवेकपूर्वक किया गया धर्म ही उत्कृष्ठ धर्म है शुद्ध सागर महाराज
कोटा
पूज्य मुनि शुद्ध सागर जी महाराज ने तलवण्डी जैन मंदिर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि अविवेक पूर्वक किया गया कोई भी कार्य चिंता का कारण बनता है। संसार का हो या धर्म का हो कार्य विवेक से ही किया जाना चहिए। हम रात्रि भोजन का त्याग करते है इसके पीछे यह विवेक यह है कि दिन में जहाँ जहाँ सूर्य की रोशनी पहुचती है वहा ताप से जीवो की उत्पति बाधित रहती है।
पूज्य मुनि श्री ने अपने उद्बोधन में कहा की वर्तमान परिपेक्ष्य में भले ही हम अपनी सुविधा से परिवर्तन करना चाहे किंतु महावीर भगवान के सिद्धांत परिवर्तित नही हो सकते।हमारे आगम में कहे लिखे नियमो में शिथिलता नही हो सकती है।
जैन मुनि से लिये गए रात्रि भोजन,पानी त्याग के नियम को सियार ने अपने प्राणों को त्याग कर भी पूरा किया और

सद्गति को प्राप्त हुआ किंतु हम समझदार होते हुए बीच का मार्ग निकाल रहे है यह बात आगम के विरुद्ध है।दिन में बना हुआ भोजन रात को करे या रात में बना भोजन दिन में करो दोनों में ही दोष बराबर है। किंतु आज के युग मे हम श्रावक बीच का मार्ग निकाल कर स्वयं को धर्मात्मा घोषित कर रहे है।संसार को दिखाने के लिए हम क्रियाएं कर रहे है स्वयं को भ्रम में रख रहे है और अपने पतन की ओर बढ़ रहे है।इसलिए हम सभी को यह चाहिए कि धर्म को विवेक के साथ ग्रहण करे और हमें जो मार्ग हमारी जिनवाणी में बताया गया है उसका पूरी आस्था के साथ अनुसरण करें।
जानकारी देते हुए राजकुमार लुहाडिया ने बताया की इस अवसर पर मन्दिर समिति के पदाधिकारी एवम महावीर दुगेरिया के नेतृत्व में रावतभाटा के समाजबन्धु उपस्थित रहे।।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
