जैनधर्म को छोड़कर दुनिया के सभी धर्म एकांतवादी है…. आचार्य प्रज्ञासागर
पुष्पगिरी
सहजता तन में,सरलता मन में और सजगता चेतन में हो तो सफलता जीवन में होती ही होती है।इसलिए पानी की तरह तरल बनो और सतत गुरुचरणों की ओर बहते रहो।गुरुचरणों में आओगे तो जमकर बर्फ बन जाओगे।बर्फ बनते ही बहने वाला पानी तैरने लगे जाएगा अर्थात जो गुरुचरणों में आता है वह तैरने की कला सीख जाता है।इसके बाद जो गुरुचरणों में बैठकर तप त्याग की साधना करता है वह वाष्प बनकर उड़ना सीख जाता है।तरल तीनों है लेकिन एक बहता है, एक तैरता है तो एक उड़ता है।हमें क्रमशः ऐसी साधना करनी है कि वाष्प की तरह उड़ने की कला सीखकर मोक्ष सुख को प्राप्त कर सकें।
उक्त विचार तपोभूमि प्रणेता प्रज्ञा सागर महाराज ने संध्याकालीन सत्र में गुरुचरणों में बैठकर आनंदयात्रा करते हुएं व्यक्त किये।
पूज्य महाराज श्री के बोलने से पूर्व गुरुदेव पुष्पदंत सागर महाराज ने सरलता इस शब्द की विविध प्रकार से चिंतन पूर्ण व्याख्या की।फिर गुरुदेव की बात को ही आधार बनाकर प्रज्ञा सागर महाराज ने थोड़ी सी बात गुरु चरणों में शब्दांजली के रूप में अर्पित की।
यहाँ उल्लेखनीय है कि पूज्य प्रज्ञा सागर महाराज सुबह मैं संघ सहित गुरुदेव के चरणों मे आए और चरण में बैठकर मांगलिक पाठ का लाभ लिया।तत्पश्चात गुरुदेव के साथ संघ सहित दर्शनार्थ मन्दिर गए।दर्शन करके अभिषेक देखा।पद्मप्रभु जिनालय में गुरुदेव ने तो पार्श्वनाथ जिनालय में प्रज्ञा सागर महाराज ने शांतिधारा करवाई।शांतिधारा का लाभ संस्कार भैया और जयपुर व निवाई से आएँ भक्तों को मिला।

स्वाध्याय प्रवचन करते हुए प्रज्ञासागर महाराज ने कहा-दुनिया के समस्त धर्म एकांतवादी है सिर्फ जैनधर्म है जो अनेकान्तवादी है।सभी धर्म एक बात को ही सत्य मानते है जबकि जैनधर्म सभी बातों को एक रूप से स्वीकार करके सत्य की प्ररूपणा करता है।एकांत “ही” पर टिका है जबकि अनेकांत “भी” पर आधारित है।अर्थात एकांतवादी कहता है ऐसा ही है जबकि अनेकान्तवादी कहता है ऐसा भी है।जैनधर्म में भी जो सिर्फ निश्चय को मानता है वह भी एकांतवादी है तो जो सिर्फ व्यवहार को मानता है वह भी एकांतवादी है।जब तक समग्रता नहीं आएगी तब तक हम अनेकांत को नहीं समझ पाएंगे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
