विशिष्ट ज्ञान को विज्ञान कहते हैं समता सागर महाराज
देवरीकला
पूज्य निर्यापक श्रमण 108 समतासागर महाराज ने मांगलिक उद्बोधन मे कहा विशिष्ट ज्ञान को विज्ञान कहते हैं इसके साथ ही उन्होने वीतरागता पर प्रकाश डाला कहा जिस विज्ञान से वैज्ञानिक परिचित नहीं हैं, उस ज्ञान को वीतराग विज्ञान कहते हैं। आगे कहा विज्ञान में कोई सार नहीं है लेकिन वीत राग विज्ञान में सार ही सार है
इस विषय पर विशेष ध्यान दिलाते कहा जिस विज्ञान से दुनिया का रिश्ता होता है वह संसारी प्राणियों को तो अच्छा लगता है लेकिन परमार्थ की दुनिया में इसका कोई सार दिखाई नहीं देता। परमार्थ की दुनिया में तो एक मात्र वीत राग विज्ञान ही है
मुनिश्री ने आगे कहा कि आचार्य प्रवर कुंदकुंद स्वामी कहते हैं कि आज भी सम्यक दर्शन ज्ञान सम्यक चरित्र के माध्यम से इंद्र पद को प्राप्त कर पुनः मनुष्य भव को प्राप्त कर मोक्ष पद को प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह में नहीं कह रहा आचार्य कुंदकुंद देव कह रहे हैं। जहां पर बाहर की मशीनें फैल हो जाती हैं तब यह हमारी मशीन काम करती है।
डाल पर लटका हुआ है आदमी और उसे दिन-रात के रूप में कुतर रहे हैं दो चूहे:
मुनिश्री ने कहा कि इसी प्रकार संसार रूपी वट वृक्ष है जिसकी डाल पर एक आदमी लटका हुआ है दिन और रात रूपी दो चूहे दोनों ओर से उस डाल को कुतर रहे हैं। नीचे एक बड़ी खाई है जिसमें काल सर्प डसने को आतुर है। वृक्ष के ऊपरी भाग में मधु मक्खी का छत्ता लगा हुआ है और नीचे काल रूपी हाथी उस वृक्ष को हिला रहा है तो ऊपर मधु मक्खी का छत्ता से मक्खियां उड़कर उस आदमी को काटती है तभी शहद की एक बूंद उस आदमी के मुंह के अंदर जाती है और उसकी मिठास में फिर वह आदमी मग्न हो जाता है तभी स्वर्ग से देवता आकर विमान में उसको बैठाना चाहते हैं लेकिन आदमी उस शहद की मिठास में इतना खो जाता है और मोह की निद्रा इतनी जबरदस्त है कि आपको सदगुरु आकर उठा रहे हैं लेकिन आप उठना ही नहीं चाहते। यह कहानी किसी दूसरे की नहीं आपकी ही है। मोह की निद्रा में खोए हुए व्यक्ति को आध्यात्म नजर
संकलित अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमंडी
