जो मान्यताओं की पट्टी बांधकर जीवन जी रहे हैं, उन्हें अध्यात्म की बिल्कुल आवश्यकता नहीं लगती। मुनि श्री निष्पक्ष सागर

धर्म

जो मान्यताओं की पट्टी बांधकर जीवन जी रहे हैं, उन्हें अध्यात्म की बिल्कुल आवश्यकता नहीं लगती। मुनि श्री निष्पक्ष सागर

खुरई

शनिवार की प्रातः बेला मे श्रुत आराधना श्रुत पंचमी पर्व मनाया गया पर्व के अंतर्गत निर्यापक श्रमण मुनिश्री संभव सागर जी महाराज के ससंघ सानिध्य में मां जिनवाणी की भव्य शोभायात्रा निकाली गई। इस बेला मे नवीन जैन मन्दिर से पालकी में मां जिनवाणी को विराजमान किया एवम शोभायात्रा मे श्रद्धालु जयकारे लगाते हुए चल रहे थे। वही आगम ग्रन्थों की  मंगल आरती भी की गई। इस बेला मे मुनिश्री निष्पक्षसागर महाराज ने उद्बोधन मे कहा कि जीवन का मूल लक्ष्य होता है स्वयं को जानना और जीवन की वास्तविकता को प्राप्त करना, आत्म साक्षात्कार को प्राप्त होना। उन्होने कहा कई लोग यह सोचते हैं कि शायद अध्यात्म की जीवन में जरूरत नहीं है, जबकि यही जीवन की सबसे पहली जरूरत है। उन्होने अध्यातम का अर्थ बताते कहा अध्यात्म का अर्थ होता  है धर्म के प्रति आस्तिक होना। व ईश्वर और आत्मा परमात्मा पर विश्वास होना। बाह्य जगत से परे अंतर्जगत की ओर कदम बढ़ाना। उन्होंने कहा कि जो मान्यताओं की पट्टी बांधकर जीवन जी रहे हैं, उन्हें अध्यात्म की बिल्कुल आवश्यकता नहीं लगती। जब आप ऐसे लोगों के साथ जिंदगी भर जीने वाले हैं, जब आपके जीवन में अध्यात्म की अति आवश्यकता है, अध्यात्म से आत्मबल मिलता है। अध्यात्म हमें ज्ञान की पराकाष्ठा तक पहुंचा देता है। अध्यात्म से विशुद्ध बुद्धि, सात्विक बल और शक्ति मिलती है। जिसके माध्यम से मनुष्य दुःखों और बाधाअें को पार कर जाता है। उन्होंने कहा कि माथे पर चंदन लगाना, बाहरी वेषभूषा बदल लेना, गले में माला डाल लेना, पूजा पाठ करना, अध्यात्म नहीं है, ये अध्यात्म के मात्र संकेत हैं। इनको निमित्त बनाकर हम अध्यात्म तक पहुंच सकते हैं। निमित्त को लक्ष्य न माने। निमित्त लक्ष्य नहीं है, लक्ष्य के लिए निमित्त होता है। अध्यात्म विद्या का मूल सूत्र है आत्मा की रक्षा। मैं कौन हूं, शरीर या आत्मा। मैं कहां रहता हूं, शरीर में, आत्मप्रदेशों में आदि का ज्ञान प्राप्त करना जानना ही अध्यात्म का ज्ञान है। महात्मा गांधी जी का कथन है- मैं तो आत्मा की अमरता पर विश्वास करता हूं। जीवन के सागर में हम सब बिंदू मात्र हैं और जीवन की वास्तविकता सत्य है, आत्मा है, परमात्मा है। पूजा पाठ करना, दया का पालन करना, दान पुण्य आदि के कार्य करना यानि वृक्ष का परिचय करना है और आत्मा को पहचानना, उसे प्राप्त करना वृक्ष की जड़ की खोज करना है और इसी का नाम अध्यात्म है।

संकलित अभिषेक जैन लुहाड़ीया रामगंजमंडी

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