भक्ति सत्य के बहुत ऊपर होती है सुधासागर महाराज
टीकमगढ़
निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव जैन धर्म की ध्वजा108 श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन मे कहा की भक्ति सत्य के बहुत ऊपर होती है उन्होंने कहा-सिद्धालय में जो विराजमान भगवान हमारे काम नहीं आयेंगें, हमारे काम मंदिर मे आदिनाथ भगवान जो मंदिर में विराजमान है वो हमारे काम आयेंगें सिद्धालय में जो विराजमान भगवान हमारे काम नही आयेगा मंदिर में विराजमान भगवान को साक्षात सिद्धालय वाले आदिनाथ भगवान विराजमान है, जिनसे हमारे सारे कार्य पूर्ण हों रहे हैं पुर्णता का आनंद आ रहा हैं।
पूज्य श्री ने आगे कहा -भक्त को बी भगवान को खोजने की आवश्यकता नहीं है, ये मस्तक जहां झुकेगा वहां भगवान होगा। जैन दर्शन में मूर्ति पूजा है ही नहीं गुणों की पूजा की जाती है। सिद्धालय में बैठा भगवान सत्य है या मन्दिर में बैठे ये आदिनाथ सत्य है हम तो साक्षात मानकर भगवान की पूजा करते हैं। अगर भक्त की भक्ति में ताकत होगी भगवान को आना पड़ेगा।

एक उदाहरण के माध्यम से कहा आचार्य श्री समंत्तभद्र स्वामी ने पाषाण पिंडी के सामने स्तुति पड़ी और चंद्रप्रभु स्वामी प्रकट हो गए बालक के समान भक्त बन जाओ बालक कहता है मुझे चन्द्रमा चाहिए विद्वान कहेंगे कि साक्षात भगवान कभी आयेंगे ही नहीं लेकिन बालक कहता है मुझे तो चन्द्रमा चाहिए तो मां चंद्रमा को थाली में पानी डालकर ले आतीं हैं ऐसे ही आप भगवान को ला सकते हैं । और आयेंगे आना पड़ेगा भगवान को। और अनुभूति में आया की भगवान आ गये भक्ति सत्य की पहुंच से बहुत आगे होती है।


पूज्य श्री ने कहा मूर्ति पूजा का विश्लेषण सत्य से बहुत आगे होता है अनहोनी का नाम अतिशय है। भगवान के चौंतीस अतिशय हमारे कोई काम के नहीं, सत्य से ऊपर भक्त जा सकता है, भक्त की भक्ति जा रही है। पूज्य श्री ने कहा-जो भी संसार में जीव है एक बात की इच्छा रखते हैं मैं सब पूर्णता का अनुभव कर संकु, संसार में जितना देखने लायक है उतना देख लु संसार की सारी संपत्ति का मालिक हो जाओ।ये सब इच्छाए सभी गतियों के जीवों की होती हैं.आहार भय परीग्रह मेथून सर्वार्थ सिद्धि के जीवों में भी ये संज्ञा पायी जाती है।सार्वभौम मुनि छठे गुणस्थाण तक तीर्थंकर, गणधर परमेष्ठी की, महा मुनिराज में भी चारों संज्ञाए है और पूर्ण नहीं कर पाये ये पुर्ण तो नही कर पायेंगें।लेकिन पुर्णता का आनंद आ जायेगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
