धर्म विपत्तियों में मुस्कुराना सिखलाता है भावसागर महाराज
खुरई
आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में धर्म सभा में मुनि श्री विमल सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि आचार्य ने आयुर्वेद ग्रंथों की रचना की, जिससे सभी स्वस्थ रहें। आत्मा के लिए आध्यात्मिक ग्रंथो की रचना की है जिससे आत्मा का कल्याण हो सके।
उन्होंने कहा कि दान बोलने के बाद निर्माल्य हो जाता है, जिसे अपने पास नहीं रखना चाहिए। मंदिर निर्माण के लिए जो भी दान बोला गया है यह अतिशीघ्र देना चाहिए।

धर्म सभा में मुनि श्री भाव सागर महाराज ने कहा कि आत्म संयम की रक्षा अपने खजाने के समान ही करें। उन्होंने आगे कहा कि अपना हित करने से दूसरे का हित होता ही है, महापुरुषों की चेष्टा आचार्य जनक होती है। धर्म विपत्तियों में मुस्कुराना सिखलाता है, प्रभु की महिमा से मनुष्य की सोई हुई शक्तियां जागृत होती है। मूर्ख विद्वान पवित्र विचारों वाला शुद्ध बन जाता है। गुरुवाणी के प्रति समर्पण नहीं हो तो कुछ भी सीखा नहीं जा सकता।
महाराज श्री ने कहा कि जगत में शिष्य उच्चारण से नहीं उच्च आचरण से शोभित होता है। ह्रदय लोक में शिष्यों का उदय हुए बिना गुरु प्राप्ति संभव नहीं, गुरु अनुभवी होते हैं। वह अनेक उतार चढ़ाव देख चुके होते हैं। समस्त सिद्धियां को देने वाला संयम होता है, संयम मनुष्य जीवन का प्राण है, जीवन रूपी कार में संयम रूपी ब्रेक होना चाहिए। सत्य के परिज्ञान होने पर वैराग्य भावना के साथ धारण किया संयम हंसी खुशी को देता है। जीवन की कीमत संयम नियम व्रत से होती है। संयम बंधन नहीं बल्कि यह संसार से छुड़ाने वाला तथा वंदनीय पूजनीय बनाने वाला है। संयम धारी को अपने हृदय को दया, करुणा से श्रृंगारित करना चाहिए।
इंद्रियों को संयमित न करने से शरीर बीमारी का घर बन जाता है। इंद्रियां उतना बुरा नहीं देखती, जितना की मन देखता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
