भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को UNESCO का वैश्विक सम्मान, महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी की पांडुलिपियां एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल
भारत की सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान परंपरा का दुनिया में बढ़ा गौरव, तीन ऐतिहासिक ग्रंथों को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान, अब क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की कुल छह प्रविष्टियां
नई दिल्ली।
भारत की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता, समृद्ध साहित्यिक विरासत और प्राचीन ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी पहचान मिली है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) ने भारत की तीन महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं साहित्यिक कृतियों **महाभारत, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और कल्हण की राजतरंगिणी** की पांडुलिपियों को अपने ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर’ में शामिल किया है।
यह उपलब्धि भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की वैश्विक महत्ता को रेखांकित करती है। इस घोषणा के साथ ही UNESCO के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की प्रविष्टियों की संख्या बढ़कर छह हो गई है।

यह निर्णय इंडोनेशिया के जकार्ता में आयोजित मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर के 11वें सत्र में लिया गया। तीनों महत्वपूर्ण कृतियों के नामांकन संबंधी दस्तावेज तैयार करने में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) की महत्वपूर्ण भूमिका रही।


### महाभारत : धर्म, नीति और जीवन मूल्यों का महासागर
महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत भारतीय संस्कृति का ऐसा महान महाकाव्य है, जिसमें धर्म, कर्म, न्याय, कर्तव्य, राजनीति और मानवीय मूल्यों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। कौरवों और पांडवों के संघर्ष के माध्यम से यह ग्रंथ मानव जीवन की जटिलताओं और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।



इसकी पांडुलिपि भोजपत्र पर शारदा लिपि में लिखी गई है। यह महत्वपूर्ण पांडुलिपि पुणे स्थित भंडारकर प्राच्यविद्या अनुसंधान संस्थान में संरक्षित है।
### कौटिल्य का अर्थशास्त्र : सुशासन और कूटनीति का प्राचीन ज्ञान
आचार्य कौटिल्य, जिन्हें चाणक्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है, द्वारा रचित अर्थशास्त्र प्राचीन भारत की राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
इसमें शासन संचालन, अर्थव्यवस्था, कर व्यवस्था, विदेश नीति, कूटनीति, सुरक्षा और राज्य प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण विषयों का विस्तृत वर्णन मिलता है।
इसकी पांडुलिपि ताड़पत्र पर ग्रंथ लिपि में लिखी गई है और मैसूर स्थित ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में संरक्षित है।


### राजतरंगिणी : कश्मीर के इतिहास का अमूल्य दस्तावेज
12वीं शताब्दी के महान कश्मीरी इतिहासकार कल्हण द्वारा संस्कृत में रचित राजतरंगिणी भारतीय ऐतिहासिक साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण कृति है।
‘राजतरंगिणी’ का अर्थ है राजाओं की नदी। इस ग्रंथ में कश्मीर के विभिन्न राजवंशों, शासकों, राजनीतिक घटनाओं और तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों का क्रमबद्ध विवरण मिलता है।
इसे भारत के प्राचीन ऐतिहासिक लेखन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है। इसकी ऐतिहासिक पांडुलिपि श्रीनगर स्थित ओरिएंटल रिसर्च लाइब्रेरी में संरक्षित है।

### संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया गौरव का क्षण
केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इस उपलब्धि पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इसे भारत की असाधारण दस्तावेजी एवं सभ्यतागत विरासत की ऐतिहासिक पहचान बताया।
उन्होंने कहा कि ये कालजयी रचनाएं भारत की ऐतिहासिक खोज, दार्शनिक चिंतन और राज्य संचालन की समृद्ध परंपराओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन ग्रंथों में संरक्षित ज्ञान आज भी मानवता के लिए प्रेरणास्रोत है।



### पहले भी भारत की तीन महत्वपूर्ण कृतियां पा चुकी हैं स्थान
UNESCO के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में वर्ष 2024 में भी भारत की तीन महत्वपूर्ण साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कृतियों को शामिल किया गया था। इनमें तुलसीदास कृत रामचरितमानस की सचित्र पांडुलिपियां, पंचतंत्र की दुर्लभ पांडुलिपि और भारतीय काव्यशास्त्र से संबंधित ‘सहृदयालोक-लोचन’ शामिल हैं।
अब महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी की पांडुलिपियों को शामिल किए जाने के बाद भारत की कुल प्रविष्टियां छह हो गई हैं।
### आने वाली पीढ़ियों के लिए अनमोल धरोहर
यह सम्मान केवल तीन प्राचीन ग्रंथों की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की उस समृद्ध बौद्धिक परंपरा का सम्मान है, जिसने सदियों से दुनिया को धर्म, दर्शन, नीति, इतिहास, सुशासन और जीवन मूल्यों का संदेश दिया है।
महाभारत मानव जीवन को धर्म और कर्तव्य का मार्ग दिखाता है, अर्थशास्त्र शासन एवं नीति का ज्ञान देता है और राजतरंगिणी इतिहास को सुरक्षित रखने की परंपरा का परिचय कराती है।
इन तीनों पांडुलिपियों को UNESCO के क्षेत्रीय रजिस्टर में स्थान मिलना इस बात का प्रमाण है कि भारत की प्राचीन ज्ञान संपदा आज भी विश्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह उपलब्धि देशवासियों के लिए गर्व का विषय होने के साथ-साथ अपनी ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित रखने की जिम्मेदारी का भी स्मरण कराती है।
