शरीर साधना का माध्यम है, अंतिम लक्ष्य नहीं; शरीर के मोह में आत्मा को भूल जाना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल : स्वस्तिभूषण माताजी

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शरीर साधना का माध्यम है, अंतिम लक्ष्य नहीं; शरीर के मोह में आत्मा को भूल जाना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल : स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन। मनुष्य जीवनभर अपने शरीर को सुंदर बनाने, सुख-सुविधाएं जुटाने और मान-सम्मान पाने में लगा रहता है, लेकिन इस भागदौड़ में वह उस आत्मा को ही भूल जाता है, जिसके कारण शरीर का अस्तित्व है। शरीर जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि आत्मकल्याण की साधना का एक माध्यम है। शरीर को ही सर्वस्व मान लेना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। आत्मचिंतन, संयम, धर्म आराधना और कर्मों की निर्जरा से ही मानव जीवन सार्थक बनता है। यह प्रेरक संदेश परम पूज्य गणिनी आर्यिका 105 स्वस्ति भूषण माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया।

 

माताजी ने शरीर और आत्मा के संबंध को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाते हुए कहा कि जब इंसान मकान बनाता है तो उसमें ईंट, पत्थर, सीमेंट और अन्य निर्माण सामग्री जुटाता है। मकान को सुंदर और आकर्षक भी बनाता है, लेकिन मकान बनाने का वास्तविक उद्देश्य उसमें निवास करना और स्वयं को सुरक्षित रखना होता है। केवल मकान की सजावट ही उसका उद्देश्य नहीं होती। ठीक इसी प्रकार शरीर भी आत्मा की साधना का माध्यम है। इसकी सार्थकता तभी है, जब इसके जरिए आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचाना जाए।

उन्होंने मोबाइल का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस मोबाइल में इंटरनेट कनेक्शन नहीं हो, वह केवल एक डिब्बे के समान रह जाता है। उसी प्रकार शरीर में चेतन आत्मा का अस्तित्व नहीं हो तो वह भी निष्प्राण ढांचा मात्र है। शरीर के सभी अंगों की क्रियाशीलता चेतन आत्मा के कारण ही है।
मोहनीय कर्म मनुष्य को बाहरी आकर्षण में उलझा देता है
माताजी ने कहा कि मोहनीय कर्म जीव के भीतर सबसे बड़ा भ्रम उत्पन्न करता है। इसके प्रभाव में मनुष्य शरीर को ही अपना सर्वस्व समझ बैठता है। वह जीवनभर शरीर की सुंदरता, भौतिक सुख-सुविधाओं, मान-सम्मान और सांसारिक वस्तुओं को संवारने में लगा रहता है, लेकिन आत्मा के कल्याण की ओर उसका ध्यान नहीं जाता। मोह के कारण जीव उन पर पदार्थों में भी ममत्व करने लगता है, जो वास्तव में उसके अपने नहीं हैं। यहां तक कि परिवर्तनशील रिश्तों और वस्तुओं को भी स्थायी मानकर उनमें आसक्ति पाल लेता है।


शरीर नश्वर, आत्मा शाश्वत; आत्मकल्याण ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य
माताजी ने कहा कि शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा शाश्वत है। संसार के सभी भौतिक आकर्षण और संबंध परिवर्तनशील हैं। मोह मनुष्य की दृष्टि को बाहरी चमक-दमक में उलझाकर आत्मकल्याण के मार्ग से दूर कर देता है। जिस प्रकार मकान की सुंदरता तभी सार्थक है, जब उसमें रहने वाला सुरक्षित और सुखी हो, उसी प्रकार शरीर की सार्थकता भी तभी है, जब उसके माध्यम से आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की दिशा में आगे बढ़े। उन्होंने प्रेरणा दी कि मनुष्य को शरीर के मोह और सांसारिक आकर्षण में अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए।

शरीर की देखभाल अवश्य करें, लेकिन उसे ही जीवन का परम लक्ष्य न बनाएं। आत्मचिंतन, संयम, धर्म आराधना और सद्कर्मों के माध्यम से आत्मा के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें। यही मानव जीवन की वास्तविक सार्थकता है।

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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