आत्मा को पहचानना है तो रिश्तों के आकर्षण और मोह से ऊपर उठना होगा : गणिनी आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी
केशवरायपाटन।
संसार में मोह का नशा ऐसा है, जो मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर कर देता है। शराब का नशा तो कुछ समय बाद उतर जाता है, लेकिन मोह का नशा जीव को जन्म-जन्मांतर तक संसार के रिश्तों, आकर्षणों और बंधनों में उलझाए रखता है। मोह आत्मा की विवेक शक्ति को ढक देता है और मनुष्य को सही-गलत का भान तक नहीं रहने देता। यह प्रेरक संदेश परम पूज्य गणिनी आर्यिका 105 स्वस्ति भूषण माताजी ने मंगलवार को दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र में आयोजित धर्मसभा में दिया।
माताजी ने मोहनीय कर्म के प्रभाव को समझाते हुए कहा कि शराब के नशे में व्यक्ति इतना विवेक खो देता है कि उसे अपने सामने खड़े माता-पिता के रिश्ते और सम्मान का भी ध्यान नहीं रहता। वह क्या बोल रहा है और किससे बोल रहा है, इसका भी भान नहीं रहता। सामान्य परिस्थितियों में कोई पुत्र अपनी मां को अपशब्द कहने की कल्पना भी नहीं कर सकता, लेकिन नशे की अवस्था में वही व्यक्ति अपनी मर्यादा भूल जाता है। उस समय ऐसा प्रतीत होता है मानो व्यक्ति स्वयं नहीं, बल्कि नशा उसके माध्यम से बोल रहा हो।

उन्होंने कहा कि ठीक इसी प्रकार मोहनीय कर्म भी जीव की चेतना और विवेक को प्रभावित करता है। मोह का प्रभाव इतना गहरा होता है कि व्यक्ति हेय और उपादेय का अंतर तक भूल जाता है। मोह भी एक प्रकार का नशा और वशीकरण है, जो जीव को उसके वास्तविक आत्मस्वरूप से दूर रखता है।

शरीर नहीं, आत्मा को पहचानने की जरूरत है
माताजी ने आत्मा और शरीर के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मोहनीय कर्म पुद्गल है, जबकि आत्मा चेतन तत्व है। दोनों का स्वरूप अलग-अलग है, लेकिन मोह के प्रभाव में जीव बाहरी संबंधों और आकर्षणों को ही अपना सर्वस्व मान बैठता है।

उन्होंने कहा कि संसार में जिन्हें हम अपना मानकर मोह करते हैं, वे सभी संबंध और आकर्षण क्षणभंगुर हैं। यहां तक कि यह शरीर भी आत्मा का वास्तविक स्वरूप नहीं है। आत्मा और शरीर अलग-अलग हैं। जब तक जीव मोहनीय कर्म के प्रभाव को नहीं समझेगा, तब तक वह संसार के आकर्षणों और रिश्तों के जाल में उलझा रहेगा।
आत्मचिंतन से ही मिलेगी मोह से मुक्ति की राह
माताजी ने धर्मसभा में संदेश दिया कि मनुष्य को केवल बाहरी संसार और रिश्तों में ही नहीं उलझे रहना चाहिए, बल्कि अपने भीतर झांककर आत्मचिंतन भी करना चाहिए। बाहरी आकर्षणों से ऊपर उठकर अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को पहचानने का प्रयास करना ही सच्ची आध्यात्मिक साधना है। जब जीव मोह के प्रभाव को समझकर अपनी चेतना को जागृत करेगा, तभी वह आत्मकल्याण और मोह के बंधनों से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

