आत्मज्ञान होने पर दुख भी सुख जैसा अनुभूत होने लगता है, प्रतिकूल परिस्थितियों में समता बनाए रखना ही सच्चा सुख है” : निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर* 

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*”आत्मज्ञान होने पर दुख भी सुख जैसा अनुभूत होने लगता है, प्रतिकूल परिस्थितियों में समता बनाए रखना ही सच्चा सुख है” : निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर*

*9 नवंबर को भगवान महावीर निर्वाण महोत्सव पर निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा*

कुण्डलपुर(दमोह)। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने आत्मज्ञान, निर्विकल्पता, कर्म सिद्धांत और समता भाव का महत्व समझाते हुए कहा कि अध्यात्म के मार्ग में निर्विकल्पता का बहुत बड़ा महत्व है। जहां संकल्प और विकल्पों का जाल है, वहां वास्तविक अध्यात्म नहीं हो सकता। संकल्प-विकल्प से रहित अवस्था ही निर्विकल्पता है। समयसार ग्रंथ केवल पढ़ने और समझने का विषय नहीं है, बल्कि उसकी वास्तविक सार्थकता आत्मानुभूति में है। समयसार का वास्तविक अर्थ आत्मसार है। ग्रंथ में तो केवल संकेत दिए गए हैं, उनके सार को अपने भीतर अनुभूत करना ही सच्ची साधना है। समयसार लिखने-पढ़ने का नहीं, बल्कि अनुभूति का नाम है। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं स्थानीय प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने आचार्य श्री के दोहे ‘हलका लगता जल भरा घट भी जल में जान, दुख सुख सा अनुभूत हो हो जब आतम ज्ञान’ की व्याख्या करते हुए कहा कि पानी से भरा घड़ा बाहर उठाने पर भारी लगता है, लेकिन जब उसे पानी के भीतर रखा जाता है तो उसका भार महसूस नहीं होता। इसी प्रकार आत्मज्ञान प्राप्त व्यक्ति के जीवन में दुख की परिस्थितियां भी सुख जैसी अनुभूत होने लगती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन में दुख नहीं आएंगे, बल्कि आत्मज्ञान के कारण व्यक्ति उन परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता। उन्होंने कहा कि जो हम चाहते हैं, वह नहीं हो पाता और जो नहीं चाहते, वही बार-बार सामने आता है, यही मानसिक व्याकुलता दुख का कारण बनती है। इष्ट का वियोग और अनिष्ट का संयोग जीवन में आते रहते हैं। गृहस्थ जीवन में अनेक जिम्मेदारियां, पारिवारिक समस्याएं और प्रतिकूल परिस्थितियां आती हैं। ऐसे समय में यदि व्यक्ति तत्वज्ञान, द्रव्य-गुण-पर्याय की व्यवस्था और कर्म सिद्धांत को समझता है तो वह परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए समता और संतोष का अनुभव कर सकता है। मुनि श्री ने कहा कि विद्यार्थी परीक्षा में सफलता मिलने पर प्रसन्न हो जाते हैं और असफलता मिलने पर निराश हो जाते हैं। इसी प्रकार व्यापारी लाभ होने पर फूला नहीं समाता और नुकसान होने पर परेशान हो जाता है। ज्ञानी व्यक्ति इन दोनों परिस्थितियों में अपने परिणामों को संभालकर रखता है, क्योंकि वह जानता है कि समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। कर्मों के उदय के अनुसार परिस्थितियां और परिणमन होते हैं। आत्मज्ञान का अर्थ वास्तविकता का बोध, अपने और पराए का भेदविज्ञान तथा आत्मा के स्वरूप को समझना है। कर्म सिद्धांत की समझ नहीं होने के कारण मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है और परिस्थितियां अनुकूल न होने पर दूसरों को दोष देने लगता है। जबकि दूसरा व्यक्ति हमारे अच्छे या बुरे परिणामों में निमित्त बन सकता है, लेकिन परिणाम का आधार अपना उपादान है। उपादान की योग्यता के बिना कोई निमित्त कुछ नहीं कर सकता। उन्होंने भरत चक्रवर्ती का उदाहरण देते हुए बताया कि जब भरत चक्रवर्ती ने स्वयं को पहला चक्रवर्ती मानकर विश्वगिरि पर्वत पर अपनी प्रशस्ति लिखवाने की इच्छा व्यक्त की तो वहां पहले से अनेक चक्रवर्तियों के नाम अंकित थे। सलाहकारों ने उन्हें किसी दूसरे का नाम मिटाकर अपना नाम लिखवाने की सलाह दी, लेकिन यह प्रसंग संदेश देता है कि अपना नाम भले ही लिखवाएं, पर किसी दूसरे का लिखा हुआ नाम मिटाने की प्रवृत्ति उचित नहीं है। मुनि श्री ने कहा कि तत्वज्ञान रखने वाला व्यक्ति दूसरों के अस्तित्व और सम्मान को समझता है। क्रोध और कषाय के आवेश में मनुष्य कह देता है कि मैं तुम्हारा सत्यानाश कर दूंगा, लेकिन तत्वज्ञान की दृष्टि से विचार करें तो किसी की सत्ता का सर्वथा नाश करना संभव नहीं है। सत्ता अर्थात अस्तित्व कभी समाप्त नहीं होता, केवल उसकी पर्याय बदलती है। उन्होंने घड़े का उदाहरण देते हुए समझाया कि घड़े को फोड़ने पर उसका आकार समाप्त हो जाता है, लेकिन उसका अस्तित्व समाप्त नहीं होता। वह टुकड़ों में और फिर चूरे के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार द्रव्य की पर्याय में निरंतर परिवर्तन होता रहता है, लेकिन उसकी सत्ता का कभी सर्वथा विनाश नहीं होता। अध्यात्म हमें इसी वास्तविकता का बोध कराता है। मुनि श्री ने कहा कि आत्मज्ञान प्राप्त व्यक्ति सुख-दुख दोनों को अपने आत्मस्वरूप से अलग समझता है। यदि कोई प्रतिकूल परिस्थिति या व्यक्ति निमित्त बनता है तो ज्ञानी उसके प्रति द्वेष रखने के बजाय यह सोचता है कि तुम्हारे निमित्त से हमारे संचित कर्मों की निर्जरा हुई और हमें समता धारण करने का अवसर मिला। ऐसी भावना से वह प्रतिकूलता में भी अनुकूलता का अनुभव करता है। परिस्थितियों को बदलना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन उनके प्रति अपने परिणामों को संभालना हमारे हाथ में है। इसलिए कषाय, अहंकार, कर्तापन और भोक्तापन की भावना छोड़कर आत्मज्ञान के माध्यम से समता भाव विकसित करना चाहिए। यही सच्चे अध्यात्म, निर्विकल्पता और आत्मानुभूति का मार्ग है।

*9 नवंबर को भगवान महावीर निर्वाण महोत्सव*

सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण महोत्सव 9 नवंबर को निर्यापक श्रमण मुनिश्री समतासागर जी, मुनि श्री पवित्र सागर जी महाराज ससंघ सानिध्य में धूमधाम से मनाया जाएगा। इस अवसर पर प्रातः मुनि श्री के प्रवचन, भक्तामर महामंडल विधान, पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, रिद्धि कलश, शांतिधारा, महावीरपूजन, विधान होगा। अत्यंत भक्ति भाव पूर्वक बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालु भक्त समुदाय द्वारा निर्वाण लाडू अर्पित किया जाएगा। सायंकाल भक्तामर दीप अर्चना, पूज्य बड़े बाबा की संगीतमय महाआरती होगी। 8 नवंबर को रात्रि में मानस्तंभ परिसर में दीपोत्सव एवं सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होगीं।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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