सेवा ही सच्चे धर्म का स्वरूप, मानव सेवा और जीवदया से ही सार्थक होता है जीवन : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
पूजा-पाठ के साथ हृदय में करुणा और हाथों में सेवा का भाव होना ही सच्ची धार्मिकता; जरूरतमंदों की सहायता और प्रत्येक जीव के प्रति दया ही धर्म की वास्तविक पहचान
सोनकच्छ। पुष्पगिरी तीर्थ के प्रणेता परम पूज्य गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के पावन सानिध्य में व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ पुष्पगिरी तीर्थ पर वर्षायोग हेतु विराजमान हैं। उनके पावन सानिध्य में प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी श्रृंखला में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने मानव सेवा, जीवदया, करुणा और परोपकार के महत्व पर प्रेरणादायी प्रवचन दिए।
आचार्य श्री ने कहा कि धर्म केवल मंदिरों में सिर झुकाने, पूजा-पाठ करने, व्रत रखने और तीर्थयात्रा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि किसी दुःखी के आंसू पोंछना, जरूरतमंद को सहारा देना और प्रत्येक जीव के प्रति करुणा रखना भी धर्म का वास्तविक स्वरूप है। पूजा धर्म का एक अंग है, लेकिन सेवा धर्म की आत्मा है।

आचार्य श्री ने कहा कि बाबू! कभी सोचा है कि धर्म क्या है? क्या सुबह-शाम पूजा करना, व्रत रखना और तीर्थयात्रा करना ही धर्म है? नहीं, धर्म का वास्तविक अर्थ है अपने जीवन में करुणा, दया, सत्य और संवेदनशीलता को धारण करना। यदि पूजा करने के बाद भी मन में दूसरों के प्रति नफरत और व्यवहार में कठोरता है, तो ऐसी धार्मिकता अधूरी है। सच्चा धार्मिक व्यक्ति वही है जो मंदिर से निकलकर किसी भूखे को भोजन कराए, किसी असहाय की मदद करे और किसी जरूरतमंद के जीवन में खुशियों का दीप जलाए।

मानव सेवा ही मानवता की सबसे बड़ी पहचान
आचार्य श्री ने कहा कि रक्तदान करना, भूखे को भोजन कराना, जरूरतमंद को वस्त्र देना, अशिक्षित को शिक्षा दिलाना और बीमार व्यक्ति की सहायता करना भी किसी महान यज्ञ से कम नहीं है। समाज में ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्हें हमारी थोड़ी-सी सहायता की आवश्यकता है। किसी वृद्ध को दवा चाहिए, किसी गरीब बच्चे को किताब चाहिए तो किसी असहाय को सहारे की जरूरत है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार थोड़ा-थोड़ा योगदान दे, तो समाज के अनेक दुखों को दूर किया जा सकता है। मानवता का वास्तविक अर्थ ही है कि मनुष्य दूसरे मनुष्य के काम आए।

जीवदया और अहिंसा ही भारतीय संस्कृति की आत्मा
आचार्य श्री ने जीवदया के महत्व को समझाते हुए कहा कि धर्म केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम, दया और संरक्षण का भाव रखना भी आवश्यक है। गाय, कुत्ते, पक्षी और अन्य छोटे-बड़े सभी जीवों में जीवन है। किसी प्यासे जीव को पानी पिलाना, भूखे प्राणी को भोजन देना और जीवों की रक्षा करना भी सच्ची धार्मिक साधना है। जो व्यक्ति किसी मूक प्राणी की पीड़ा नहीं समझ सकता, वह करुणा और अहिंसा के वास्तविक महत्व को कैसे समझ पाएगा? जीवदया हमारी संस्कृति और संस्कारों की आत्मा है।
निस्वार्थ सेवा से ही समाज में आएगा सकारात्मक परिवर्तन
आचार्य श्री ने युवाओं, महिलाओं और समाज के प्रत्येक नागरिक से सेवा के कार्यों में आगे आने का आह्वान करते हुए कहा कि जब सेवा निस्वार्थ भाव से की जाती है, तब वह समाज परिवर्तन का माध्यम बन जाती है। युवा नशामुक्ति अभियान चलाएं, महिलाएं जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा का दायित्व उठाएं और सक्षम व्यक्ति कमजोर एवं जरूरतमंद लोगों की सहायता करें। सेवा का कोई छोटा या बड़ा स्वरूप नहीं होता। किसी भटके हुए व्यक्ति को सही रास्ता दिखाना, किसी निराश व्यक्ति को हौसला देना और किसी दुखी के चेहरे पर मुस्कान लाना भी महान सेवा है।
आचार्य श्री ने भावपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि बाबू! अंत में इतना ही समझना कि मंदिर की घंटियों से भी अधिक मधुर आवाज उस इंसान की दुआ में होती है, जिसकी तुमने निस्वार्थ भाव से सहायता की है।
धर्म को केवल अपने मस्तक पर तिलक बनाकर मत रखो, उसे अपने हृदय में करुणा और अपने हाथों में सेवा बनाकर उतारो। यही सच्ची धार्मिकता है, यही मानवता है और यही जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग है। प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
