दुनिया की नजरों से बच सकते हैं, लेकिन आत्मा की नजरों से नहीं : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

धर्म

जब कोई नहीं देख रहा हो, तब आपका चरित्र क्या करता है?

 

दुनिया की नजरों से बच सकते हैं, लेकिन आत्मा की नजरों से नहीं : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

 

एकांत में सही आचरण करना ही वास्तविक चरित्र की पहचान — पुष्पगिरि तीर्थ पर गुरु भक्तों को मिला आत्ममंथन और आत्मसंयम का संदेश

 

औरंगाबाद। दुनिया के सामने अच्छा बनना आसान है, लेकिन जब कोई देखने वाला न हो, तब भी अपने आचरण को पवित्र बनाए रखना ही व्यक्ति के वास्तविक चरित्र की पहचान है। चेहरे पर मुस्कान, वाणी में मिठास और व्यवहार में विनम्रता रखकर लोगों का दिल जीता जा सकता है, लेकिन चरित्र की असली परीक्षा एकांत में होती है। दुनिया की नजरों से बचना संभव है, लेकिन अपनी आत्मा की नजरों से बचना असंभव है। यह प्रेरक संदेश व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए दिया।

 

 

पुष्पगिरि तीर्थ सोनकच्छ में परम पूज्य तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सान्निध्य में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज का वर्षायोग चल रहा है। इसी धर्मसभा में आचार्य श्री ने व्यक्ति के चरित्र, आत्मानुशासन, नैतिक मूल्यों और आत्मनिरीक्षण के महत्व को सरल एवं प्रभावशाली शब्दों में समझाया।

भीड़ में व्यवहार सभ्यता, एकांत में आचरण चरित्र

 

आचार्य श्री ने कहा कि बाबू, भीड़ में अच्छा व्यवहार करना आपकी सभ्यता है, लेकिन एकांत में भी अच्छा बने रहना आपका चरित्र है। जब कैमरा बंद हो, कोई निगरानी करने वाला न हो और गलत काम करने पर पकड़े जाने का डर भी न हो, तब व्यक्ति क्या निर्णय लेता है, यही उसके संस्कारों की वास्तविक कसौटी है।

व्यक्ति की पहचान केवल उसके बाहरी व्यक्तित्व, वेशभूषा या समाज में प्रतिष्ठा से नहीं होती, बल्कि उसके उन कार्यों से होती है जिन्हें वह बिना किसी प्रशंसा या पुरस्कार की अपेक्षा के करता है। दुकान पर ईमानदारी, मंदिर में भक्ति और समाज के सामने विनम्रता तभी सार्थक हैं, जब यही गुण एकांत में भी कायम रहें। किसी जरूरतमंद के साथ अकेले में कैसा व्यवहार किया जाता है और अवसर मिलने पर भी गलत काम से कैसे बचा जाता है, यही वास्तविक चरित्र है। मुखौटा कोई भी पहन सकता है, लेकिन मुखौटा उतरने के बाद जो शेष रहता है, वही व्यक्ति का असली स्वरूप है।

 

स्वयं के प्रति ईमानदार रहना सबसे जरूरी

 

आचार्य श्री ने कहा कि दूसरों को धोखा देना आसान हो सकता है, लेकिन स्वयं को धोखा देना सबसे बड़ी भूल है। जब कोई देखने वाला न हो, तब भी सही मार्ग पर चलने का साहस ही आत्मिक जागरूकता है। व्यक्ति संसार से अपने कार्यों को छिपा सकता है, लेकिन अपनी आत्मा से कुछ नहीं छिपा सकता।

उन्होंने प्रेरित करते हुए कहा कि ऐसा जीवन जीना चाहिए, जिसमें अपनी अंतरात्मा के सामने खड़े होने में कभी संकोच न हो। जब व्यक्ति बाहरी प्रशंसा के बजाय अपने विवेक की आवाज सुनकर निर्णय लेने लगता है, तभी उसके जीवन में वास्तविक नैतिकता का विकास होता है।

 

बाहरी पहरे से नहीं, भीतर के अनुशासन से बनता है चरित्र

 

आचार्य श्री ने आत्मसंयम की आवश्यकता बताते हुए कहा कि पुलिस के डर से ईमानदार बने रहना भय है, जबकि किसी बाहरी नियंत्रण के बिना सही आचरण करना वास्तविक अनुशासन है। सच्चा अनुशासन वह है, जिसमें पहरेदार बाहर नहीं, बल्कि भीतर होता है।

 

मन चंचल है और उसे हर समय कुछ नया चाहिए। इच्छाओं और विचारों पर नियंत्रण रखकर उन्हें सही दिशा देना ही आत्मसंयम है। पुष्पगिरि की मौन साधना का संदेश भी यही है कि बाहर का सन्नाटा भीतर के अनुशासन और आत्मचिंतन का माध्यम बन सकता है। जब व्यक्ति अपने मन को समझना सीख जाता है, तब उसके निर्णय परिस्थितियों के दबाव में नहीं, बल्कि विवेक के आधार पर होने लगते हैं।

 

छोटे-छोटे निर्णयों से बनता है व्यक्तित्व

 

आचार्य श्री ने कहा कि चरित्र एक दिन में तैयार नहीं होता। यह प्रतिदिन लिए जाने वाले छोटे-छोटे निर्णयों से बनता है। एक बार झूठ बोलना आसान हो सकता है, लेकिन हर परिस्थिति में सच का साथ देना चरित्र है। संस्कार कोई ऐसे वस्त्र नहीं हैं, जिन्हें अवसर देखकर पहना और उतार दिया जाए। संस्कार तो जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, जो व्यक्ति के विचारों, व्यवहार और निर्णयों में दिखाई देने चाहिए।

 

उन्होंने संदेश दिया कि अच्छे संस्कारों और नैतिक मूल्यों को केवल उपदेशों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने दैनिक जीवन का स्थायी हिस्सा बनाना चाहिए। सही आचरण तब और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, जब गलत करने का अवसर सामने हो और फिर भी व्यक्ति सही रास्ता चुनने का संकल्प बनाए रखे।

 

आत्मा को अपना गवाह बनाकर जिएं

 

आचार्य श्री का संदेश है कि दुनिया व्यक्ति को उसके चेहरे से पहचान सकती है और समाज उसके व्यवहार के आधार पर उसका मूल्यांकन कर सकता है, लेकिन उसके चरित्र की वास्तविक पहचान उस समय होती है, जब उसके पास गलत करने का अवसर हो और वह फिर भी सही मार्ग का चुनाव करे।

 

उन्होंने प्रेरणादायी शब्दों में कहा कि बाबू, कैमरे की नजर से बच सकते हो, दुनिया की नजरों से भी बच सकते हो, लेकिन अपने विवेक की अदालत से नहीं बच सकते। इसलिए जीवन ऐसा जियो कि एकांत में भी तुम्हारी आत्मा तुम्हारी गवाह बने, तुम्हारे विरुद्ध नहीं।

 

आचार्य श्री का यह संदेश प्रत्येक व्यक्ति को आत्ममंथन करने की प्रेरणा देता है कि वह दूसरों को दिखाने के लिए अच्छा बन रहा है या वास्तव में अपने भीतर अच्छाई को विकसित कर रहा है। सच्चा चरित्र वही है, जो प्रशंसा की अपेक्षा के बिना भी सही आचरण करना सिखाए।

 

— जानकारी : नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, प्रचार-प्रसार संयोजक, औरंगाबाद।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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