🍂 याद कीजिए उस बीते हुए दौर को… जब देवगढ़ के जिनालयों में जाने से भी लोग कतराते थे! 🍂
कभी ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर बने पत्थर के जिनालय भी उपेक्षा की धूल ओढ़कर जीर्ण-शीर्ण हो चले थे। जिन प्रांगणों में कभी भक्तों के चरणों की आहट गूँजती होगी, वहाँ सूखे पत्तों के ढेर के ढेर जमा थे। उन पत्तों पर पैर रखते ही खर्र… खर्र… की ऐसी विचित्र आवाज़ें उठतीं कि बच्चे तो बच्चे, बड़े-बड़े लोग भी सहम जाते थे। भय ऐसा कि लोग वहाँ जाने से कतराते थे और वैभवशाली अतीत की गाथा कहने वाले वे जिनालय मानो अपने उद्धार की प्रतीक्षा कर रहे थे।
लेकिन प्रकृति की गोद में बसी पवित्र धरोहरों का भाग्य भी कभी-कभी किसी महामना के चरण-स्पर्श से बदल जाता है!
जी हाँ! हम बात कर रहे हैं बेतवा नदी के पावन तट के निकट, ऊँचे पहाड़ों पर विराजमान भगवान शांतिनाथ के उत्तुंग जिनबिम्बों और भव्य जिनालयों की श्रृंखलाओं से सुशोभित ऐतिहासिक देवोदय तीर्थ, देवगढ़ जी की।


एक ऐसा तीर्थ, जिसकी शिलाओं में इतिहास साँस लेता है, जिसकी प्राचीनता में आस्था का आलोक छिपा है और जिसकी भव्यता के दर्शन मात्र से मन श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है।
कभी उपेक्षा के अंधकार में डूबे इस तीर्थ के पुनरुद्धार का सौभाग्य मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज के करकमलों से साकार हुआ। यह केवल पत्थरों और प्राचीन जिनालयों का जीर्णोद्धार नहीं था, बल्कि हमारी धरोहर, हमारी आस्था और हमारी सांस्कृतिक चेतना को फिर से जागृत करने का महनीय उपक्रम था।


और देवोदय का यह कितना बड़ा सौभाग्य है कि जिस तीर्थ के जीर्णोद्धार से इस क्षेत्र की नई पहचान का अध्याय जुड़ा, उस पुण्य कार्य के साथ जगत पूज्य गुरुदेव का नाम जुड़ा हुआ है। जिस धरोहर को समय ने धूमिल किया, उसे गुरुदेव की प्रेरणा ने फिर से गौरव के शिखर पर पहुँचाने का मार्ग दिखाया।



आज देवोदय की महिमा शब्दों की सीमाओं से परे, अगम्य-सी प्रतीत होती है। यहाँ की पावन धरा, प्राचीन जिनबिम्बों की दिव्यता और पहाड़ों पर विराजमान जिनालयों की भव्यता श्रद्धालुओं को अतीत से जोड़ती है और वर्तमान में धर्म की अनुपम अनुभूति कराती है।

आज इस गौरवगाथा में एक और भावपूर्ण अध्याय जुड़ा है। देवोदय तीर्थ के पदाधिकारियों ने अपनी श्रद्धा, कृतज्ञता और भावनाओं को शब्दों में पिरोकर जगत पूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में समर्पित किया है।
यह केवल शब्दों का समर्पण नहीं, बल्कि उस उपकार के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है, जिसने एक ऐतिहासिक तीर्थ के पुनरुत्थान को नई दिशा दी।
🙏 देवोदय तीर्थ के समस्त पदाधिकारियों एवं इस पुण्य कार्य से जुड़े प्रत्येक श्रद्धालु के भावों की हृदय से अनुमोदना!
आपकी भावनाएँ उन अनगिनत भक्तों की श्रद्धा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिनके लिए तीर्थ केवल पत्थरों से बने भवन नहीं, बल्कि आत्मकल्याण की प्रेरणा देने वाले पवित्र केंद्र हैं।
गुरुदेव के चरण जहाँ पड़ते हैं, वहाँ केवल मार्ग ही नहीं बनते—आस्था को नई दिशा, धरोहर को नया जीवन और इतिहास को नया गौरव भी मिलता है।
गुरु भक्त — श्रीश ललितपुर
