बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं की ऊर्जा मिलकर बदल सकती है समाज की तस्वीर : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

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बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं की ऊर्जा मिलकर बदल सकती है समाज की तस्वीर : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

पुष्पगिरि तीर्थ में पीढ़ियों के समन्वय पर दिया प्रेरक संदेश; बोले—जब पीढ़ियां एक-दूसरे का हाथ थामती हैं, तब इतिहास बनते हैं

औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर)।

“अनुभव बुजुर्गों का हो और ऊर्जा युवाओं की हो, तो समाज की तस्वीर बदल सकती है।” यह प्रेरक संदेश व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने पुष्पगिरि तीर्थ, सोनकच्छ में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी परिवार और समाज की वास्तविक शक्ति उसकी पीढ़ियों के बीच सामंजस्य, आपसी सम्मान और संस्कारों के आदान-प्रदान में निहित होती है। जब बुजुर्गों का अनुभव और युवाओं की नवीन सोच एक दिशा में आगे बढ़ते हैं, तब प्रगति के नए मार्ग खुलते हैं।

 

 

पुष्पगिरि तीर्थ प्रणेता परम पूज्य गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के सान्निध्य में तीर्थ पर विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में आचार्य श्री ने पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी को कम करने और अनुभव तथा ऊर्जा के समन्वय से सशक्त, संस्कारवान एवं प्रगतिशील समाज के निर्माण का संदेश दिया।

 

बुजुर्ग जड़ें हैं, तो युवा उस वृक्ष के फल

आचार्य श्री ने कहा कि बुजुर्गों का जीवनानुभव और युवाओं की नवीन सोच एक-दूसरे के पूरक हैं। बुजुर्ग जड़ों के समान हैं, तो युवा उस वृक्ष के फल हैं। जड़ों के बिना फल संभव नहीं और फल के बिना जड़ों की उपयोगिता का विस्तार दिखाई नहीं देता। दोनों का अपना महत्व है।

 

उन्होंने समझाया कि बुजुर्गों के पास जीवन का अनुभव और सही-गलत को पहचानने की दृष्टि होती है, जबकि युवाओं के पास नई संभावनाओं को साकार करने का उत्साह, साहस और ऊर्जा होती है। एक के पास मंजिल का नक्शा है, तो दूसरे के पास आगे बढ़ने की गति। जब दोनों साथ आते हैं, तो मंजिल तक पहुंचने का रास्ता आसान हो जाता है।

 

संवाद की कमी से बढ़ती है पीढ़ियों के बीच दूरी

आचार्य श्री ने कहा कि आज परिवारों में समस्या केवल विचारों के अंतर की नहीं, बल्कि संवाद की कमी की भी है। युवा अपनी व्यस्तता में बुजुर्गों की बात सुनने के लिए समय नहीं निकालते, तो कई बार बुजुर्ग भी युवाओं की बदलती परिस्थितियों और नई सोच को समझने का प्रयास नहीं करते। इससे आपसी दूरियां बढ़ने लगती हैं।

उन्होंने परिवारों को प्रेरित करते हुए कहा कि घर में कुछ समय ऐसा अवश्य होना चाहिए, जब मोबाइल बंद हों और दिल से दिल का संवाद शुरू हो। परिवार के सदस्य साथ बैठें, बातचीत करें और एक-दूसरे की भावनाओं को समझें। साथ बैठकर चाय पीना और अपने सुख-दुःख साझा करना भी पीढ़ियों के बीच मजबूत सेतु बन सकता है।

अनुभव बताएगा सावधानी, ऊर्जा खोजेगी नए रास्ते

आचार्य श्री ने मार्गदर्शन और नवाचार के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि बुजुर्गों का अनुभव युवाओं को गलतियों से बचाता है, जबकि युवाओं की ऊर्जा नई दिशाओं की खोज करने का साहस देती है।

बुजुर्ग कहते हैं—“संभलकर चलो, आगे गड्ढा है।” युवा कहता है—“आइए, एक नया रास्ता बनाते हैं।” समाज को दोनों दृष्टिकोणों की आवश्यकता है। अनुभव यह सिखाता है कि किन गलतियों से बचना चाहिए, जबकि ऊर्जा यह बताती है कि नई संभावनाओं को कैसे साकार किया जा सकता है।

यदि युवा बुजुर्गों के अनुभव का सम्मान करें और बुजुर्ग युवाओं के नए विचारों को अवसर दें, तो परिवारों में टकराव के स्थान पर सहयोग और विरोध के स्थान पर विकास का वातावरण बन सकता है।

संस्कारों को तकनीक से जोड़ें युवा

आचार्य श्री ने कहा कि संस्कारों का संरक्षण और समाज का विकास दोनों पीढ़ियों की साझा जिम्मेदारी है। बुजुर्ग अपने जीवन के अनुभव, परंपराएं और संस्कार नई पीढ़ी को सौंपें, वहीं युवा आधुनिक तकनीक और नए माध्यमों के जरिए इन संस्कारों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दादा अपने पोते को कोई प्रेरक कहानी सुनाएं और पोता उसी कहानी को तकनीक के माध्यम से दुनिया तक पहुंचाए, तो परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम हो सकता है। इस प्रकार नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहते हुए प्रगति की ऊंचाइयों को छू सकती है।

पुष्पगिरि में दिखाई देता है समन्वय का संदेश

आचार्य श्री ने पुष्पगिरि तीर्थ की गतिविधियों को अनुभव, मार्गदर्शन और सामूहिक प्रयासों के समन्वय का उदाहरण बताते हुए कहा कि संतों का आध्यात्मिक अनुभव, श्रद्धालुओं की आस्था और युवाओं की सक्रियता मिलकर धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों को नई दिशा दे सकती है। समाज को आगे बढ़ाने के लिए केवल विचार पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उन विचारों को व्यवहार में उतारने के लिए सभी पीढ़ियों का सहयोग भी आवश्यक है।

उन्होंने संदेश दिया कि जड़ों का सम्मान किया जाए और शाखाओं को विस्तार दिया जाए। बुजुर्गों के अनुभव से दिशा लेकर युवाओं की ऊर्जा से परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया जाए।

आचार्य श्री के अनुसार, जब पीढ़ियां आपस में टकराती हैं, तो परिवार बिखरते हैं; लेकिन जब वे एक-दूसरे का हाथ थामती हैं, तो इतिहास बनता है। इसलिए बुजुर्गों का सम्मान, युवाओं पर विश्वास और दोनों के बीच निरंतर संवाद ही एक आदर्श परिवार तथा सशक्त समाज की आधारशिला है।

— प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियुष कासलीवाल, औरंगाबाद।

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