मोबाइल स्मार्ट हो गया, लेकिन इंसान खुद से दूर होता जा रहा है : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज
‘फोन को स्मार्ट रहने दो, खुद को पागल मत होने दो’; मोबाइल की बढ़ती लत पर गुरुजी ने किया आत्मचिंतन का आह्वान
पुष्पगिरि तीर्थ में गुरु भक्तों को दिया संदेश, परिवार और रिश्तों को समय देने की अपील
औरंगाबाद/सोनकच्छ।
आज के बदलते दौर में टेक्नोलॉजी का प्रभाव मानव जीवन पर इतना गहरा हो गया है कि मोबाइल स्मार्ट होता जा रहा है, लेकिन इंसान धीरे-धीरे खुद से ही दूर होता जा रहा है। कभी आपने सोचा है कि जिस मोबाइल में आज दुनिया भर की जानकारी समाई हुई है, उसी मोबाइल के कारण इंसान अपने परिवार, रिश्तों और स्वयं के लिए समय निकालना भूलता जा रहा है? यह विचार व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपने प्रेरणादायी संदेश में व्यक्त किए।
गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने आधुनिक जीवनशैली, मोबाइल के बढ़ते उपयोग और मानवीय संवेदनाओं में आती कमी पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया।



आचार्य श्री ने कहा कि पहले इंसान के पास छोटा-सा फोन होता था, लेकिन उसका दिल बड़ा होता था। आज फोन स्मार्ट हो गया है, मगर इंसान कहीं न कहीं खुद को असहाय बनाता जा रहा है। फोन में सब कुछ सुरक्षित रहता है, लेकिन कई बार इंसान को अपना ही मोबाइल नंबर याद नहीं रहता। है ना आश्चर्य!
उन्होंने कहा कि मोबाइल हमें बार-बार चेतावनी देता है कि उसकी बैटरी कम हो रही है, लेकिन इंसान अपनी ऊर्जा और मानसिक शांति कब से खोता जा रहा है, इसका उसे एहसास तक नहीं होता। बाहरी दुनिया की जानकारी जुटाने में व्यस्त व्यक्ति अपने भीतर झांकना भूल गया है।



AI से हर सवाल का जवाब, लेकिन खुद से सवाल नहीं!
आचार्य श्री ने आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते उपयोग की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि आज पढ़ा-लिखा इंसान हर सवाल का जवाब तकनीक से पूछ रहा है, लेकिन कभी अपने भीतर झांककर यह पूछने का प्रयास नहीं करता कि मैं कौन हूं? मैं क्या कर रहा हूं? और मुझे कैसा इंसान बनना है? ज्ञान के साधन बढ़ रहे हैं, लेकिन आत्मचिंतन की प्रवृत्ति कमजोर होती जा रही है। यह भी एक आश्चर्य है!
पास बैठे लोग दूर, दूर बैठे लोग मोबाइल पर करीब
आचार्य श्री ने कहा कि पहले जब लोग आपस में मिलते थे, तो आंखों में आंखें डालकर बातचीत करते थे। एक-दूसरे की भावनाओं को समझते थे और रिश्तों को समय देते थे। आज स्थिति यह है कि लोग आमने-सामने बैठकर भी मोबाइल की स्क्रीन में खोए रहते हैं। शरीर पास होते हैं, लेकिन मन कहीं और भटक रहा होता है।
विज्ञान और टेक्नोलॉजी ने हजारों किलोमीटर की दूरियां मिटा दी हैं, लेकिन कभी-कभी एक ही घर में रहने वाले लोगों के बीच भावनात्मक दूरियां बढ़ा दी हैं। अपनों से बातचीत करने के लिए समय नहीं है, लेकिन दुनिया भर की खबरें देखने और सोशल मीडिया पर घंटों बिताने के लिए समय जरूर है। मोबाइल ने हमें दुनिया से तो जोड़ दिया, लेकिन खुद से और अपनों से दूर भी कर दिया है।
बाहरी ज्ञान बढ़ रहा है, लेकिन आत्मबोध घट रहा है
आचार्य श्री ने युवाओं और बच्चों को संदेश देते हुए कहा कि मोबाइल के माध्यम से जानकारी प्राप्त करना गलत नहीं है, लेकिन उसके अत्यधिक उपयोग के कारण अपनी सोचने-समझने की क्षमता, एकाग्रता और विवेक को कमजोर नहीं होने देना चाहिए। बाहरी ज्ञान और जानकारी बढ़ाने के साथ-साथ भीतर की समझ, संस्कार और मानवीय संवेदनाओं को भी मजबूत करना जरूरी है।
उन्होंने संकेत दिया कि वास्तविक समझदारी केवल तकनीक चलाने में नहीं, बल्कि उसका सही उपयोग करने में है। मोबाइल हमारे जीवन को सरल बनाने का साधन बने, न कि हमारे समय, विचारों और रिश्तों पर हावी होने का माध्यम।
दिन में तीन समय मोबाइल से बनाएं दूरी
आचार्य श्री ने जीवन में छोटे-छोटे बदलाव अपनाने की प्रेरणा देते हुए कहा कि मोबाइल को स्मार्ट रहने दीजिए, लेकिन खुद को उसका गुलाम मत बनाइए। इसके लिए दिन में कम से कम तीन समय मोबाइल को स्वयं से दूर रखने का अभ्यास करें—भोजन करते समय, शौचालय में जाते समय और बिस्तर पर लेटते समय। परिवार के सदस्यों के साथ बैठें, तो मोबाइल को साइलेंट या वाइब्रेशन मोड पर रखें और अपनों की बातों को ध्यानपूर्वक सुनें।
उन्होंने प्रेरणादायी संदेश देते हुए कहा कि जब परिवार के सदस्य एक-दूसरे को समय देंगे, बातचीत करेंगे और भावनाओं को समझेंगे, तभी घर का वातावरण प्रेम, शांति और आत्मीयता से भर सकेगा।
अपनों को पहचानिए, रिश्तों को समय दीजिए
आचार्य श्री का संदेश है कि मोबाइल की स्क्रीन पर दुनिया तलाशने से पहले अपने आसपास बैठे अपनों को पहचानिए। जीवन की वास्तविक खुशियां केवल डिजिटल दुनिया में नहीं, बल्कि परिवार के साथ बिताए गए समय, सच्चे संबंधों और आत्मिक शांति में छिपी हैं।
उन्होंने जीवन के इस महत्वपूर्ण सत्य की ओर ध्यान दिलाया कि नेटवर्क कमजोर होने से जीवन नहीं रुकता, लेकिन रिश्तों का नेटवर्क कमजोर हो जाए, तो जीवन की खुशियां जरूर कम हो जाती हैं।
प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
