सामायिक से होती है असंख्यात गुणी कर्मनिर्जरा : मुनि श्री योगसागर जी महाराज
श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान के चतुर्थ दिवस समता, संयम और आत्मसाधना का संदेश
कोटा, 21 अक्टूबर 2026।
बुधवार, आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी के पावन अवसर पर श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में चल रहे श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान के चतुर्थ दिवस निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने सामायिक के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सामायिक का तात्पर्य समता भाव की साधना और आत्मा में रमण करना है। यह चित्त के विकल्पों एवं विकारों को शांत कर आत्मविशुद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है। समता, संयम और आत्मचिंतन के माध्यम से साधक आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है।
सामायिक समता और आत्मविशुद्धि की साधना
मुनि श्री ने कहा कि सामायिक दो प्रकार की होती है—द्रव्य सामायिक और भाव सामायिक। सामायिक के माध्यम से साधक पांचों पापों से विरत होने तथा आत्मसंयम को जीवन में उतारने का अभ्यास करता है। सामायिक के समय चित्त की एकाग्रता बढ़ाने, धर्मध्यान करने और तीर्थयात्रा, मंदिर दर्शन एवं स्वाध्याय जैसे धार्मिक विषयों का चिंतन-मनन करने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने बताया कि सामायिक राग-द्वेष तथा आर्तध्यान और रौद्रध्यान से बचने का श्रेष्ठ माध्यम है। जब व्यक्ति कुछ समय के लिए सांसारिक उलझनों से मन हटाकर आत्मचिंतन में लगाता है, तब उसके भीतर शांति, विवेक और समता का विकास होता है। सामायिक केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि अपने भावों को परखने और आत्मा की ओर लौटने का अभ्यास है।

एकाग्रता और जिनवाणी श्रवण से बढ़ती है भावविशुद्धि
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि एकांत एवं शांत स्थान पर शरीर के प्रति ममत्व का त्याग कर ज्ञान को निर्मल बनाने का प्रयास करने से सामायिक में विशुद्धि आती है। वीतरागी जिनवाणी को गुरु मुख से श्रद्धा और भक्तिपूर्वक सुनने से अंतरंग में संयम के भाव जागृत होते हैं।
उन्होंने कहा कि सम्यक दर्शन सहित सामायिक करने से असंख्यात गुणी कर्मनिर्जरा होती है। सामायिक के दौरान मन को स्थिर रखना, अशुभ विचारों से बचना और धर्मध्यान में प्रवृत्त रहना आवश्यक है। जब साधक श्रद्धा, विवेक और समता के साथ आत्मसाधना करता है, तब उसकी धार्मिक क्रिया भावपूर्ण साधना का रूप लेती है।



ज्ञान के साथ आचरण भी आवश्यक
मुनि श्री ने कहा कि आचरण से रहित ज्ञान व्यक्ति को मद, कषाय, राग-द्वेष और विषय-भोगों की ओर ले जा सकता है। इसलिए भेदविज्ञान में स्थित होकर मन, वचन और काय को शुभ कार्यों तथा धर्मध्यान में लगाना आवश्यक है। केवल ज्ञान अर्जित करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारना भी जरूरी है।
उन्होंने बताया कि गुणानुवाद से चित्त में स्थिरता आती है। आहार में नीरसता अर्थात् स्वाद के प्रति आसक्ति कम करना, जीवन में संयम रखना और लाभ-हानि सहित अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में समान भाव बनाए रखना समता साधना के महत्वपूर्ण अंग हैं। परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन साधक को अपने विवेक और आत्मसंयम को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
त्रिगुप्ति और समभाव से प्रशस्त होता है मोक्षमार्ग
प्रवचन में मुनि श्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि पुण्य ऐसा अर्जित करना चाहिए, जिससे पाप कर्मों की निर्जरा हो और पुण्यानुबंधी पुण्य का संचय बने। सामायिक में मन, वचन और काय की त्रिगुप्ति धारण कर आत्मसाधना में लीन होने से मोक्षमार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने कहा कि साधक को अपने मन, वचन और काय की प्रवृत्तियों पर सजग दृष्टि रखनी चाहिए। समता, संयम और आत्मचिंतन को जीवन का अंग बनाकर ही वह आत्मा की निर्मलता की दिशा में आगे बढ़ सकता है। सामायिक का वास्तविक लाभ तभी है, जब उसके प्रभाव से व्यवहार में शांति, विचारों में पवित्रता और सभी परिस्थितियों में समभाव रखने की क्षमता विकसित हो।
आज के प्रमुख पुण्यार्जक
श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ छोटूलाल, प्रेमलता एवं दीपक धनोत्या परिवार ने प्राप्त किया।
कलश स्थापना का पुण्यलाभ कैलाश चंद एवं लाड बाई ठग परिवार ने अर्जित किया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन इन्द्र कुमार तरुण, कुशाल जैन, टोंक तथा आयुष शास्त्री, देहीखेड़ा द्वारा किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।
श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ अजय कुमार जैन एवं किरण जैन परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य मुकेश जैन दोराया को प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धालु ने प्राप्त किया।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए तथा जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
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🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश
आज के प्रवचन का सार
सामायिक समता, आत्मसंयम और आत्मविशुद्धि की साधना है। मन को राग-द्वेष से बचाकर, मन-वचन-काय को संयमित रखकर तथा जिनवाणी के उपदेशों को आचरण में उतारकर साधक कर्मनिर्जरा की दिशा में आगे बढ़ता है। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव बनाए रखना तथा आत्मा के शुद्ध स्वरूप का चिंतन करना ही सच्ची सामायिक का उद्देश्य है।
मुख्य प्रेरणा
“सामायिक में केवल शरीर को स्थिर न करें, मन को भी समता में स्थिर करें। राग-द्वेष का त्याग, मन-वचन-काय का संयम और आत्मचिंतन ही आत्मविशुद्धि तथा मोक्षमार्ग की सच्ची साधना है।
सामायिक चित्त के विकारों को शांत कर आत्मविशुद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है
सम्यक दर्शन सहित सामायिक से होती है असंख्यात गुणी कर्मनिर्जरा
मन, वचन और काय की त्रिगुप्ति से आत्मसाधना को मिलता है बल
अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव रखना ही समता साधना का मूल आधार
