त्याग से ही आत्मा के शुद्ध स्वभाव की प्राप्ति संभव : मुनि श्री योगसागर महाराज

धर्म

त्याग से ही आत्मा के शुद्ध स्वभाव की प्राप्ति संभव : मुनि श्री योगसागर महाराज

 

कल्पद्रुम महामंडल विधान के तृतीय दिवस धर्म, संयम और आत्मकल्याण का संदेश

 

कोटा, 20 अक्टूबर 2026।

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में आयोजित श्री कल्पद्रुम महामंडल विधान के तृतीय दिवस निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने धर्म, त्याग, व्रत, संयम और आत्मकल्याण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि धर्म का वास्तविक अर्थ आत्मा के शुद्ध स्वभाव में स्थित होना है। त्याग के माध्यम से ही मनुष्य अपने शुद्ध स्वरूप का अनुभव कर सकता है। बाहरी वस्तुओं के प्रति ममता और आसक्ति छोड़कर आत्मचिंतन की ओर बढ़ना ही सच्ची धर्मसाधना है।

 

 

 

ग्रहण करने की प्रवृत्ति छोड़ें, त्याग को बनाएं जीवन का आधार

मुनि श्री ने कहा कि अनादिकाल से जीव में ग्रहण करने और संग्रह करने की प्रवृत्ति रही है, जबकि आत्मकल्याण का मार्ग त्याग से प्रशस्त होता है। मनुष्य को निरंतर चिंतन करना चाहिए कि मैं शुद्ध आत्मतत्त्व हूं, बाहरी वस्तुओं से मेरा वास्तविक संबंध क्या है और मैं दूसरों की परिस्थितियों एवं व्यवहार से अनावश्यक रूप से प्र भावित क्यों होऊं।

 

उन्होंने समझाया कि विषय-भोगों की क्षणभंगुरता को समझने पर ही उनके प्रति वैराग्य का भाव जागृत होता है। जब व्यक्ति बाहरी पदार्थों को स्थायी सुख का साधन मानना छोड़ देता है, तब उसका ध्यान आत्मिक शांति और आत्मस्वरूप की ओर केंद्रित होने लगता है। ममता, आसक्ति और परिग्रह का त्याग जीवन में संतोष, समता और शुद्ध भावों के विकास का आधार बनता है।

व्रतों में दृढ़ता ही आत्मसंयम की पहचान

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि व्रत ग्रहण करने के बाद उनमें दृढ़ता बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। मन की चंचलता और इच्छाओं की अधिकता के कारण व्रतों के पालन में शिथिलता आ सकती है। इसलिए प्रत्येक श्रावक को अपनी सामर्थ्य के अनुसार नियम निर्धारित करके उनका निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए।

उन्होंने शिक्षा व्रतों के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि ये व्रत आत्मसंयम, त्याग और मुनि जीवन की प्रेरणा प्रदान करते हैं। इनके माध्यम से व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना, जीवन को अनुशासित बनाना और सभी जीवों के प्रति समभाव रखना सीखता है। व्रतों की सार्थकता केवल उन्हें ग्रहण करने में नहीं, बल्कि उनके अनुरूप जीवन जीने में है।

 

स्वाध्याय, ध्यान और तप से होती है कर्मनिर्जरा

मुनि श्री ने स्वाध्याय, ध्यान, तप और दान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान की वाणी एवं जिनागम का अध्ययन करके उसकी शिक्षाओं को अपने आचरण में उतारना ही सच्चा स्वाध्याय है। धर्मग्रंथों का ज्ञान तभी सार्थक होता है, जब वह मनुष्य के विचारों और व्यवहार में परिवर्तन लाए।

 

 

उन्होंने कहा कि तप और आत्मचिंतन से कर्मनिर्जरा का मार्ग प्रशस्त होता है। व्यक्ति को अपनी प्रवृत्तियों का निरीक्षण करते हुए यह समझना चाहिए कि कौन-से भाव उसे आत्मकल्याण से दूर ले जा रहे हैं। जब वह ममता, आसक्ति और परिग्रह को कम करने का प्रयास करता है, तब उसके भीतर आत्मिक शांति, संतोष और समता का भाव विकसित होता है।

 

 

पापों की निर्जरा का भाव ही आत्मकल्याण की दिशा

प्रवचन के मुख्य संदेश में मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को अपने पापों का परिमाण निर्धारित करके उन्हें सीमित करने का प्रयास करना चाहिए। केवल पुण्य की कामना करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अशुभ भावों और कर्मबंध के कारणों को पहचानकर उनसे मुक्त होने की भावना भी आवश्यक है।

 

 

त्याग, संयम, स्वाध्याय और आत्मचिंतन को जीवन में अपनाकर ही आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है। जब मनुष्य अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करता है, व्रतों में दृढ़ रहता है और आत्मा के शुद्ध स्वरूप का चिंतन करता है, तभी उसकी साधना वास्तविक अर्थों में फलवती होती है।

मुनि श्री की देशना ने श्रद्धालुओं को बाहरी संग्रह के बजाय आंतरिक गुणों की वृद्धि करने तथा आत्मशुद्धि के लिए निरंतर पुरुषार्थ करने की प्रेरणा दी।

जन्मदिन पर महाआरती का पुण्यार्जन

इस मांगलिक अवसर पर हुकम काका का जन्मदिन मनाया गया। चक्रवर्ती बन हरसोरा परिवार के पदम, राजेंद्र, हुकम काका, प्रकाश एवं प्रतीक हरसोरा ने महाआरती का पुण्यार्जन किया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने मंगलभाव के साथ शुभकामनाएं व्यक्त कीं और धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता की।

 

 

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ छोटूलाल, प्रेमलता एवं दीपक धनोत्या परिवार ने प्राप्त किया।

कलश स्थापना का पुण्यलाभ कैलाश चंद एवं लाड बाई ठग परिवार ने अर्जित किया।

श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन अनिल, मोहित एवं रोहित, गाजियाबाद; छोटूलाल, प्रेमलता एवं दीपक, बड़ा नयागांव वाले; तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।

श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ अजय कुमार जैन किरण जैन परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य मुकेश जैन दोराया को प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धालु ने प्राप्त किया।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए तथा जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

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🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश

आज के प्रवचन का सार

त्याग आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर बढ़ने का मार्ग है। विषय-भोगों की आसक्ति, ममता और परिग्रह को कम करके तथा व्रत, संयम, स्वाध्याय और तप को जीवन में अपनाकर आत्मिक शांति प्राप्त की जा सकती है। धर्म का वास्तविक उद्देश्य केवल पुण्य अर्जित करना नहीं, बल्कि अशुभ भावों को त्यागकर आत्मा की निर्मलता की दिशा में आगे बढ़ना है।

मुख्य प्रेरणा

“संग्रह से आसक्ति बढ़ती है और त्याग से आत्मचिंतन का मार्ग खुलता है। अपनी इच्छाओं को सीमित करें, व्रतों में दृढ़ रहें और आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचानने का पुरुषार्थ करें—यही आत्मकल्याण की सच्ची साधना है।”

विषय-भोगों से विरक्ति और परिग्रह का त्याग आत्मिक शांति का आधार

व्रतों में दृढ़ता, स्वाध्याय और तप से प्रशस्त होता है कर्मनिर्जरा का मार्ग

पुण्य की कामना से अधिक पापों की निर्जरा का भाव रखना आवश्यक

     अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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