विजयादशमी पर ताजा हुई 13 वर्ष पुरानी दीक्षा की स्मृतियां, रामगंजमंडी में इसी दिन गूंजे थे वैराग्य के जयकारे

धर्म

# विजयादशमी पर ताजा हुई 13 वर्ष पुरानी दीक्षा की स्मृतियां, रामगंजमंडी में इसी दिन गूंजे थे वैराग्य के जयकारे

 

**गणिनी आर्यिका 105 विंध्य श्री माताजी के सानिध्य में ब्रह्मचारी अंगूरी दीदी और नारंगी दीदी ने अपनाया था संयम मार्ग, दीक्षा के बाद मिला था नया नाम**

 

**रामगंजमंडी।*

* कुछ पल केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि लोगों के हृदय में ऐसी अमिट छाप छोड़ जाते हैं, जिन्हें वर्षों बाद भी याद करते ही श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य की भावनाएं जाग उठती हैं। रामगंजमंडी के धार्मिक इतिहास में विजयादशमी का दिन भी एक ऐसी ही अविस्मरणीय स्मृति से जुड़ा है। वर्ष 2013 में इसी पावन अवसर पर नगर के श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन नसिया के प्रांगण में दो दीक्षाओं का ऐतिहासिक आयोजन हुआ था। आज 13 वर्ष बाद विजयादशमी के अवसर पर उन पावन क्षणों की स्मृतियां एक बार फिर जीवंत हो उठी हैं।

 

 

यह वह अवसर था, जब आचार्य श्री 108 विराग सागर महाराज की परम शिष्या गणिनी आर्यिका 105 विंध्य श्री माताजी के सानिध्य में ब्रह्मचारी अंगूरी दीदी एवं ब्रह्मचारी नारंगी दीदी ने सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर संयम और आत्मसाधना के पथ पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया था। दीक्षा के ये पावन संस्कार पंडित श्री ऋषभ जैन, नागपुर के कुशल निर्देशन में संपन्न हुए थे।

### 13 वर्ष पहले नगर में गूंजे थे वैराग्य और त्याग के जयकारे

 

रामगंजमंडी में लंबे समय बाद एक साथ दो दीक्षाओं का यह आयोजन श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक अनुभूति लेकर आया था। दीक्षा समारोह के दौरान पूरा वातावरण धर्ममय हो गया था। श्रद्धालुओं की उपस्थिति, भक्ति का उल्लास और त्याग के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा ने इस आयोजन को नगर के धार्मिक इतिहास की यादगार घटनाओं में शामिल कर दिया।

विजयादशमी जैसे पावन पर्व पर संपन्न हुई इन दीक्षाओं का महत्व आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष है। वर्ष 2013 में जिस दिन इन दोनों दीक्षाओं के माध्यम से संयम जीवन की नई शुरुआत हुई थी, संयोग से 13 वर्ष बाद भी विजयादशमी का पर्व उन स्मृतियों को ताजा करने का अवसर लेकर आया है।

 

### दो परिवारों को मिला आध्यात्मिक सौभाग्य

 

इस ऐतिहासिक अवसर पर दोनों दीक्षार्थियों के परिवारों को अपनी बेटियों के संयम जीवन की यात्रा के साक्षी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ब्रह्मचारी अंगूरी दीदी के परिवार के रूप में श्री जम्बूकुमार एवं श्रीमती हेमिता मित्तल परिवार और ब्रह्मचारी नारंगी दीदी के परिवार के रूप में श्री अजीत कुमार एवं श्रीमती सुमित्रा सेठी परिवार इस पुण्य प्रसंग से जुड़े रहे।

दीक्षा का यह क्षण परिवारों के लिए भावनात्मक होने के साथ-साथ आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। सांसारिक जीवन के आकर्षणों से ऊपर उठकर धर्म, त्याग, तप और आत्मकल्याण का मार्ग चुनना जैन परंपरा में सर्वोच्च साधनाओं में गिना जाता है।

### नए नामों की घोषणा पर जयघोष से गूंज उठा था पंडाल

 

दीक्षा समारोह का सबसे भावपूर्ण और अविस्मरणीय क्षण वह था, जब पूज्य गणिनी आर्यिका 105 विंध्य श्री माताजी ने दीक्षा संस्कार संपन्न कराते हुए दोनों दीक्षार्थियों के नवीन नामों की घोषणा की। जैसे ही माताजी के श्रीमुख से ब्रह्मचारी अंगूरी दीदी का नाम **आर्यिका 105 परम श्री माताजी** और ब्रह्मचारी नारंगी दीदी का नाम **क्षुल्लिका 105 पर्वश्री माताजी** घोषित हुआ, पूरा पंडाल तालियों और जयकारों से गूंज उठा।

यह केवल नाम परिवर्तन का अवसर नहीं था, बल्कि संयममय जीवन की एक नई आध्यात्मिक पहचान का शुभारंभ था। उपस्थित श्रद्धालुओं ने इस पावन प्रसंग को श्रद्धा और भक्ति के साथ अपने मन में संजो लिया।

 

### स्मृतियों में आज भी जीवंत है वह ऐतिहासिक दिन

 

समय आगे बढ़ता रहता है, लेकिन कुछ आयोजन अपनी आध्यात्मिक गरिमा और भावनात्मक महत्व के कारण कभी विस्मृत नहीं होते। रामगंजमंडी में वर्ष 2013 की विजयादशमी पर संपन्न हुई ये दीक्षाएं भी ऐसी ही स्मृतियों में शामिल हैं, जो आज 13 वर्ष बाद भी नगरवासियों को त्याग, तपस्या, संयम और आत्मकल्याण के मार्ग की याद दिलाती हैं।

विजयादशमी के इस पावन अवसर पर उन ऐतिहासिक क्षणों का स्मरण करना केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक प्रेरणा को पुनः अनुभव करना है, जो जीवन को धर्म और आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश देती है।दीक्षा से पूर्व जब केशलोचन हुआ बिना किसी उपकरण के जो अपने आप में देखने वालों को द्रवित कर गया जैन दर्शन में केशलोचन एक बड़ा तप है इसके बिना दीक्षा। अधूरी है।

 

 

**रिपोर्ट: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी**9929747312

 

 

 

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