*रावण के पुतले नहीं, अपने भीतर के विकारों का करें दहन: मुनि श्री समतासागर महाराज**:
कुण्डलपुर(म.प्र.)।
निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार किसी भी द्रव्य का पूर्ण विनाश नहीं होता, बल्कि उसकी पर्यायों में निरंतर परिवर्तन होता रहता है। संसार में जन्म-मृत्यु, सुख-दुख और प्राप्ति-वियोग इसी परिवर्तन के क्रम हैं। इस सत्य को समझने वाला व्यक्ति परिस्थितियों में समता बनाए रखता है और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है। जीवन की वास्तविक सार्थकता बाहरी परिवर्तन में उलझने के बजाय आत्मा के स्वरूप को समझने और अपने आचरण को सुधारने में है।
प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं कुण्डलपुर क्षेत्र प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने ‘उत्पाद-व्यय-ध्रौव्ययुक्तं सत्’ और ‘सत् द्रव्यलक्षणम्’ सूत्रों की व्याख्या करते हुए कहा कि द्रव्य की सत्ता बनी रहती है, केवल उसकी पर्याय बदलती है। मिट्टी से घड़ा बनता है और घड़ा टूटने पर मिट्टी के टुकड़े रह जाते हैं। इसी प्रकार सोने के कलश को गलाकर मुकुट बनाया जाए, तो कलश का स्वरूप समाप्त होता है, लेकिन सोना बना रहता है। कलश के नष्ट होने पर मां को शोक, मुकुट बनने पर बालक को प्रसन्नता और सोने की सत्ता को समझने वाले पिता को मध्यस्थता का भाव होता है। यही उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य का सिद्धांत है। जीवन में परिवर्तन को सहजता से स्वीकार करना ही समता भाव का आधार है।
मुनि श्री ने कहा कि जीव भी अपनी पर्यायों में परिवर्तन करता हुआ चारों गतियों में भ्रमण करता रहता है। मृत्यु आने पर मनुष्य को अपना घर छोड़ना पड़ता है और कर्मानुसार दूसरी पर्याय प्राप्त होती है। जीव एक घर से दूसरे घर में जाता रहता है, लेकिन आत्मकल्याण के स्थायी मार्ग तक नहीं पहुंच पाता। प्रकृति में पतझड़ के बाद बसंत आता है, सूर्य-चंद्रमा छिपते और फिर दिखाई देते हैं, ऋतुएं बदलती हैं तथा मनुष्य की आयु भी सांसों के साथ बीतती जाती है। ओस की बूंद और अंजुलि का पानी जिस तरह टिक नहीं पाता, उसी तरह यौवन और जीवन भी क्षणभंगुर हैं। इसलिए समय रहते आत्मचिंतन करना आवश्यक है।
आचार्य भगवन् के जीवन से जुड़ा प्रसंग सुनाते हुए मुनि श्री ने बताया कि नेमावर में स्वाध्याय के दौरान आचार्य श्री ने एक दिन कहा कि इतने दिनों से समझाने के बाद भी यदि बात समझ में नहीं आ रही, तो वे रोज-रोज क्यों समझाते जा रहे हैं। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने प्रेरणा दी कि गुरुजनों के उपदेशों को केवल सुनना पर्याप्त नहीं, उन्हें जीवन में उतारना भी जरूरी है।
दशहरा पर्व की प्रासंगिकता पर मुनि श्री ने कहा कि हर वर्ष रावण के पुतले की ऊंचाई बढ़ाने की होड़ लगी है, जबकि आवश्यकता अपने भीतर के रावण को समाप्त करने की है। समाज में रावण जैसी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं, लेकिन राम के आदर्श जीवन में कम दिखाई दे रहे हैं। अहंकार, क्रोध, लोभ, छल और हिंसा का त्याग किए बिना रावण दहन की सार्थकता अधूरी है। केवल पुतला जलाने से बुराइयां समाप्त नहीं होंगी, इसके लिए विचारों और आचरण में परिवर्तन लाना होगा।
उन्होंने कहा, “जन-जन रावण, घर-घर लंका, इतने राम कहां से लाएं।” मुनि श्री ने कहा कि बुराइयों पर विजय के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर सत्य, मर्यादा, संयम और सदाचार के गुण विकसित करने होंगे। जैन परंपरा में रामायण के प्रसंगों का विशिष्ट वर्णन मिलता है। दशहरा हमें प्रेरणा देता है कि बाहरी पुतला जलाने के साथ भीतर के विकारों का भी दहन करें। भगवान महावीर के अहिंसा और संयम के सिद्धांतों तथा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्शों को अपनाना ही पर्व की वास्तविक सार्थकता है।
मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि तीर्थयात्रा केवल दर्शन-वंदना तक सीमित न रहे, बल्कि जीवन में परिवर्तन का माध्यम बने। बड़े बाबा के दर्शन के साथ आत्मचिंतन, समता और सदाचार का संकल्प लेकर लौटें। महापुरुषों के उपदेशों को आचरण में उतारकर ही जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312






