रिश्तों में हर बात कह देना समझदारी नहीं, कुछ बातों को मौन में छोड़ देना भी प्रेम है : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

धर्म

रिश्तों में हर बात कह देना समझदारी नहीं, कुछ बातों को मौन में छोड़ देना भी प्रेम है : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

मौन साधना में लिखित संदेश में दिया संबंधों को सहेजने का मंत्र; हर बहस में जीतने की जिद रिश्तों को कमजोर कर सकती है

/सोनकच्छ।

रिश्तों की खूबसूरती हर बात कह देने में नहीं, बल्कि यह समझने में है कि कब बोलना है और कब मौन रहना है। कई बार मौन वह काम कर जाता है, जो लंबे तर्क और बहस भी नहीं कर पाते। रिश्तों में प्रेम, विश्वास और आत्मीयता बनाए रखने का यही संदेश व्रत चक्रवर्ती, पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपनी मौन साधना के दौरान लिखित संदेश के माध्यम से दिया है। गुरु भक्तों के लिए लिखित संदेश में आचार्यश्री ने रिश्तों को मधुर बनाए रखने और मन में शांति बनाए रखने की प्रेरणा दी।

 

 

 

सही होकर भी हर बार अपनी बात मनवाना जरूरी नहीं

आचार्यश्री के संदेश के अनुसार, कई बार व्यक्ति सही होते हुए भी अपनी बात मनवाने की जिद करता है। ऐसे में वह बहस तो जीत सकता है, लेकिन रिश्ते हार सकता है। एक कठोर शब्द वर्षों की आत्मीयता को चोट पहुंचा सकता है, जबकि शांत मौन कई बार रिश्ते को टूटने से बचा लेता है।

संदेश में जीवन की इस महत्वपूर्ण सीख को रेखांकित किया गया है कि हर बहस में जीतने की कोशिश करना, हर बात पर अपनी श्रेष्ठता साबित करना और हर गलतफहमी को उसी क्षण दूर करने की जिद करना आवश्यक नहीं है। कुछ बातों को समय पर छोड़ देना चाहिए, कुछ लोगों को उनकी सोच के अनुसार रहने देना चाहिए और कुछ परिस्थितियों को मौन के हवाले कर देना चाहिए।

 

 

समय सबसे बड़ा न्यायाधीश

आचार्यश्री ने संदेश के माध्यम से समझाया कि समय बहुत बड़ा न्यायाधीश है। जो लोग आज किसी व्यक्ति को गलत समझ रहे हैं, संभव है कि समय के साथ वे उसकी नीयत और भावनाओं को समझने लगें। इसलिए परिस्थितियां विपरीत होने पर भी मन में कटुता नहीं आने देना चाहिए।

मौन का वास्तविक महत्त्व तभी है, जब उसके भीतर शांति हो, अहंकार नहीं। यदि मौन मन को शांत रखने, संबंधों को बचाने और विवादों को बढ़ने से रोकने का माध्यम बने, तो वह कमजोरी नहीं, बल्कि समझदारी और भावनात्मक परिपक्वता का प्रतीक है।

मौन में छिपा है संबंधों को सहेजने का संदेश

 

 

अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज का यह संदेश आज के समय में विशेष प्रासंगिक है, जब छोटी-छोटी बातों पर विवाद और गलतफहमियां रिश्तों में दूरी पैदा कर देती हैं। संदेश प्रत्येक व्यक्ति को आत्मचिंतन करने की प्रेरणा देता है कि शब्दों का चयन सोच-समझकर करें, दूसरों की भावनाओं का सम्मान करें और संबंधों में प्रेम एवं विश्वास को प्राथमिकता दें

आचार्यश्री का संदेश यही है कि हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं, हर बहस जीतना जरूरी नहीं और हर गलतफहमी को तुरंत मिटाना भी जरूरी नहीं। कभी-कभी मौन ही प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति बन जाता है।

: नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, प्रचार-प्रसार संयोजक, छत्रपति संभाजीनगर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *