त्याग, तप और साधना की प्रेरणापुंज हैं पट्ट गणिनी आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी
प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गणिनी आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी का दीक्षा दिवस त्याग, तपस्या, वैराग्य और आत्मसाधना के आदर्शों का स्मरण कराने वाला विशेष अवसर है।
आर्यिका दीक्षा केवल वेश परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बदलने वाला आध्यात्मिक संकल्प है। यह संसार के आकर्षणों से ऊपर उठकर आत्मकल्याण, आत्मशुद्धि और जीवमात्र के प्रति करुणा का भाव जागृत करने का मार्ग है। विज्ञमति माताजी का संयममय जीवन इसी आध्यात्मिक भावना की प्रेरणा देता है।
वर्ष 2008 में कोटा की पावन धरा पर ग्रहण की आर्यिका दीक्षा
प्रज्ञा पद्मिनी पट्ट गणिनी आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी ने **9 अक्टूबर 2008 को कोटा के गुमानपुरा मल्टीपरपज स्कूल में गणिनी आर्यिका 105 विशुद्धमति माताजी से आर्यिका दीक्षा ग्रहण की।** दीक्षा के साथ ही उन्होंने संयम, त्याग, तप और आत्मकल्याण के आध्यात्मिक मार्ग को अपने जीवन का ध्येय बनाया।
दीक्षा का यह संकल्प सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानने और जीवन को धर्ममय बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। जैन परंपरा में साधु-साध्वियों का जीवन पंचमहाव्रत, अहिंसा, अपरिग्रह, सत्य, संयम और आत्मानुशासन की भावना से जुड़ा होता है। यह मार्ग साधक को बाहरी आकर्षणों के बजाय अपने भीतर झांकने और आत्मिक उन्नति का प्रयास करने की प्रेरणा देता है
आर्यिका विज्ञमति माताजी का दीक्षा दिवस और उनका संयममय जीवन समाज को यह प्रेरणा देता है कि मनुष्य को अपने जीवन में सदाचार, विनम्रता, करुणा और आत्मानुशासन को महत्व देना चाहिए। धर्म का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि विचारों, व्यवहार और जीवनशैली में सकारात्मक परिवर्तन लाना भी है।
#त्याग और तपस्या से मिलता है आत्मकल्याण का मार्ग
जैन धर्म में त्याग और तपस्या को आत्मशुद्धि का महत्वपूर्ण साधन माना गया है। संयम का मार्ग कठिन अवश्य है, लेकिन यह व्यक्ति को इच्छाओं पर नियंत्रण, मानसिक स्थिरता और आत्मचिंतन की दिशा में आगे बढ़ाता है। आर्यिका जीवन में प्रत्येक कदम साधना, अनुशासन और आध्यात्मिक लक्ष्य के प्रति समर्पण का प्रतीक होता है।
विज्ञमति माताजी का दीक्षा दिवस श्रद्धालुओं के लिए केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि अपने जीवन में धर्म, नैतिकता और सदाचार को अपनाने का संकल्प लेने का भी अवसर है। उनके आध्यात्मिक जीवन से प्रेरणा लेकर व्यक्ति अपने व्यवहार में अहिंसा, क्षमा, सहिष्णुता और परोपकार के भाव विकसित कर सकता है।
समाज के लिए प्रेरणा है संयममय जीवन
आज के भौतिकतावादी दौर में जहां मनुष्य अनेक प्रकार की इच्छाओं, प्रतिस्पर्धा और तनाव से घिरा हुआ है, वहीं जैन साध्वियों का संयममय जीवन आत्मचिंतन और आंतरिक शांति का मार्ग दिखाता है। त्याग का अर्थ केवल वस्तुओं का परित्याग नहीं, बल्कि अहंकार, आसक्ति और नकारात्मक भावनाओं से मुक्त होने का प्रयास भी है।
विजयादशमी के पावन अवसर पर विज्ञमति माताजी के दीक्षा दिवस का स्मरण समाज को यह संदेश देता है कि जीवन की सार्थकता केवल भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति, सदाचार और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता में भी निहित है।
यही मंगल भावना है कि पट्ट गणिनी आर्यिका 105 विज्ञमति माताजी की संयम साधना से समाज को धर्म, अहिंसा, त्याग और आत्मकल्याण की प्रेरणा मिलती रहे तथा जन-जन के जीवन में सद्भाव, करुणा और आध्यात्मिक चेतना का प्रकाश प्रस्फुटित हो
नमन पदमकुमार, सुलोचना, अभिषेक लुहाड़िया रामगंजमंडी
