# विज्ञान और चिकित्सा जगत की हस्तियों ने आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज के दर्शन कर लिया आशीर्वाद
**इष्टोपदेश ग्रंथ के स्वाध्याय में मिला आत्मचिंतन, राग-द्वेष के त्याग और आत्मकल्याण का संदेश; अजितनाथ मंदिर समाज समिति ने किया अतिथियों का अभिनंदन**
**बड़ौत।**
लौकिक ज्ञान और आध्यात्मिक चेतना का सुंदर संगम उस समय देखने को मिला, जब दिल्ली से भारत सरकार के कृषि मंत्रालय में उपमहानिदेशक एवं वैज्ञानिक डॉ. देवकुमार जैन तथा दुबई से पधारीं पिरियोडॉन्टिस्ट (दंत एवं मसूड़ों की विशेषज्ञ) डॉ. पद्मलोचनी जैन ने आचार्य श्री 108 आर्जवसागर जी महाराज के दर्शन कर उनका मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। दोनों विशिष्ट व्यक्तित्वों ने आचार्य श्री के श्रीचरणों में नमन कर नमोस्तु निवेदित किया तथा आध्यात्मिक एवं तात्त्विक विषयों पर चर्चा की।
इस अवसर पर अजितनाथ मंदिर समाज समिति की ओर से अतिथियों का बहुमान एवं अभिनंदन किया गया। विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे इन विशिष्ट व्यक्तित्वों का संत सान्निध्य में पहुंचकर आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त करना इस बात का प्रेरक उदाहरण है कि जीवन में लौकिक ज्ञान के साथ आत्मज्ञान का भी विशेष महत्त्व है।

## इष्टोपदेश के स्वाध्याय से आत्मकल्याण की प्रेरणा
आचार्य श्री आर्जवसागर जी महाराज के सान्निध्य में प्रतिदिन प्रातः 8:30 बजे से जैन दर्शन के महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक ग्रंथ *इष्टोपदेश* का स्वाध्याय चल रहा है। आचार्य पूज्यपाद स्वामी द्वारा रचित यह ग्रंथ आत्मस्वरूप की पहचान, संसार के मोह से मुक्ति, राग-द्वेष के त्याग और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान करता है।


ग्रंथ के श्लोकों के भावार्थ को स्पष्ट करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि अज्ञान और राग-द्वेष के कारण मनुष्य संसार के आकर्षणों में उलझकर अपने आत्मकल्याण के वास्तविक उद्देश्य से दूर हो जाता है। क्रोध, प्रतिशोध और दूसरों को दुःख पहुंचाने की भावना जीवन में अशांति को बढ़ाती है। इसके विपरीत क्षमा, संयम, विवेक और आत्मनिरीक्षण व्यक्ति को आंतरिक शांति की ओर ले जाते हैं।


इष्टोपदेश की शिक्षाएं मनुष्य को यह समझने की प्रेरणा देती हैं कि संसार के सुख-दुःख और परिस्थितियां परिवर्तनशील हैं। इसलिए जीवन की सार्थकता केवल भौतिक उपलब्धियों और बाहरी आकर्षणों में नहीं खोजनी चाहिए। शरीर और आत्मा के भेद को समझकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने का प्रयास करना ही आत्मिक उन्नति की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।

सम्यक दृष्टि, आत्मचिंतन और वीतरागता की भावना आत्मकल्याण के प्रमुख आधार हैं। जब मनुष्य अपने विचारों, भावनाओं और आचरण का निरीक्षण करता है, तब उसे अपनी कमियों को पहचानने और उनमें सुधार करने का अवसर मिलता है। यही आत्मजागरण आगे चलकर जीवन में संयम, सदाचार और सकारात्मक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है।


## तनावपूर्ण जीवन में जैन दर्शन का संदेश प्रासंगिक
वर्तमान समय में भौतिक प्रगति के साथ मनुष्य अनेक प्रकार के मानसिक और सामाजिक तनावों का सामना कर रहा है। ऐसे दौर में जैन दर्शन का अहिंसा, आत्मसंयम, क्षमा और राग-द्वेष से मुक्ति का संदेश विशेष महत्त्व रखता है। इष्टोपदेश का नियमित स्वाध्याय श्रद्धालुओं को जिनवाणी के सिद्धांतों को समझने के साथ उन्हें दैनिक जीवन में अपनाने की प्रेरणा दे रहा है।
आचार्य श्री का मार्गदर्शन यह संदेश देता है कि वास्तविक शांति बाहरी परिस्थितियों को बदलने मात्र से नहीं, बल्कि अपने भीतर के भावों को समझने और उन्हें निर्मल बनाने से प्राप्त होती है। आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति अपने व्यवहार में विनम्रता, सहिष्णुता और करुणा का विकास कर सकता है।
## विज्ञान, चिकित्सा और अध्यात्म—मानव कल्याण के पूरक आयाम
डॉ. देवकुमार जैन और डॉ. पद्मलोचनी जैन का आचार्य श्री के दर्शनार्थ पहुंचना इस तथ्य को रेखांकित करता है कि विज्ञान, चिकित्सा और अध्यात्म मानव जीवन के महत्त्वपूर्ण एवं परस्पर पूरक आयाम हैं। विज्ञान और चिकित्सा जहां समाज के स्वास्थ्य एवं विकास में योगदान देते हैं, वहीं अध्यात्म व्यक्ति को नैतिकता, आत्मानुशासन और जीवन के गहरे उद्देश्य को समझने की प्रेरणा देता है।
आचार्य श्री के सान्निध्य में चल रहा इष्टोपदेश ग्रंथ का स्वाध्याय आत्मिक जागरण का माध्यम बन रहा है। जिनवाणी का अध्ययन, गुरु का मार्गदर्शन और सिद्धांतों को आचरण में उतारने का प्रयास व्यक्ति को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
**‘गुरु आर्जव वाणी’ के माध्यम से जन-जन तक यही संदेश पहुंच रहा है कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह जीवन में विवेक, सदाचार, करुणा और आत्मकल्याण की भावना को विकसित करे।**
**जानकारी एवं संकलन:** अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
