*”धन की महानता उसकी मात्रा में नहीं, सदुपयोग और भावना में है” :- निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज*
कुण्डलपुर।
निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि जीवन स्वर्ग बनेगा या नर्क, यह परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उनके प्रति हमारी समझ और दृष्टिकोण से तय होता है। संतोष का भाव हो तो अभावों में भी सुख का अनुभव किया जा सकता है, जबकि असंतोषी व्यक्ति वैभव और सुविधाओं के बीच भी अशांत रहता है। इसलिए जीवन को सार्थक बनाने के लिए विचारों और परिणामों को निर्मल बनाना आवश्यक है।
प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने स्वाध्याय और गुरु-सान्निध्य का महत्व समझाते हुए कहा कि शास्त्र जीवन को दिशा देते हैं, लेकिन गुरु अपने अनुभव से उनमें वर्णित सिद्धांतों को सरल और व्यवहारोपयोगी बना देते हैं। धर्म केवल पढ़ने-पढ़ाने या अच्छी बातें कहने का विषय नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारने की साधना है। पूजन, अभिषेक, दान और सेवा का वास्तविक आनंद तभी मिलता है, जब ये हमारे आचरण का हिस्सा बनते हैं। मुनि श्री ने कहा कि जिनशासन का रथ दो पहियों पर चलता है। एक ओर मुनि, आर्यिका, ऐलक और क्षुल्लक जैसे त्यागी साधक हैं, तो दूसरी ओर गृहस्थ श्रावक-श्राविकाएं हैं। त्यागी परमार्थ के लिए अपना सर्वस्व त्यागते हैं, जबकि गृहस्थ अपनी सामर्थ्य के अनुसार धर्म और समाज के कार्यों में योगदान देते हैं। दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है। गृहस्थ जीवन में धन अर्जित करना अपने आप में परिग्रह नहीं है। मेहनत और ईमानदारी से अर्जित धन का उपयोग परिवार के दायित्वों के साथ वृद्ध माता-पिता की सेवा, दान, पूजा, धर्मप्रभावना और समाजहित के कार्यों में किया जाए, तो वही धन परमार्थ का माध्यम बन सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धन का संग्रह और परिग्रह अलग-अलग बातें हैं। धन के प्रति तीव्र मोह, आसक्ति और उसका केवल विषय-भोगों में उपयोग करने की भावना परिग्रह का कारण बनती है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति धन का विवेकपूर्ण उपयोग करता है और उसे जनहित, समाजहित तथा राष्ट्रहित में लगाने के लिए तत्पर रहता है, उसके लिए धन सेवा का साधन बन जाता है। गृहस्थ को पारिवारिक दायित्व निभाने के साथ परमार्थ के कार्यों में भी उत्साहपूर्वक योगदान देना चाहिए। जबलपुर की पिसनहारी की मढ़िया का उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने कहा कि एक ओर रानी दुर्गावती का मदन महल वैभव का प्रतीक था, तो दूसरी ओर एक गरीब महिला ने अनाज पीसकर मेहनत से कमाए धन में से बचत करके जिनप्रतिमा स्थापित करने और छोटी-सी मढ़िया बनवाने का संकल्प लिया। समय के साथ मदनमहल खंडहर में बदल गया, जबकि उस महिला की श्रद्धा और परिश्रम से बनी मढ़िया तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित हो गई। यह उदाहरण बताता है कि धन की महानता उसकी मात्रा में नहीं, बल्कि उसके सदुपयोग और उसके पीछे निहित भावना में होती है। महाराज श्री ने कुण्डलपुर के बड़े बाबा के मंदिर का उल्लेख करते हुए कहा कि यह देश-विदेश के दिगंबर जैन समाज की श्रद्धा, सहयोग और समर्पण का प्रतीक है। यह धरोहर किसी एक व्यक्ति या क्षेत्र की नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज की आस्था का केंद्र है। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की साधना और प्रेरणा ने कुण्डलपुर को विशिष्ट पहचान प्रदान की है। उन्होंने श्रद्धालुओं से धर्म, गुरु और तीर्थ के प्रति श्रद्धा बनाए रखते हुए जीवन को सदाचार, सेवा और परमार्थ से जोड़ने का आह्वान किया। इस अवसर पर विभिन्न ग्रामों और नगरों से आए श्रद्धालुओं ने बड़े बाबा के दर्शन, अभिषेक और शांतिधारा में सहभागिता की। मुनि श्री ने कहा कि सच्चा सुख बाहरी वैभव में नहीं बल्कि संतोष, त्याग, सेवा और निर्मल परिणामों में निहित है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
