गुरु शिष्य के मिलन को देखने हजारों की संख्या में लोग अणु नगरी रावतभाटा में उमड़े आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज संघ सानिध्य में मनाया गया प्रभु का जन्म कल्याणक महोत्सव
रावतभाटा
जिस नगरी को संपूर्ण विश्व में अणु नगरी के रूप में जाना जाता है वह वह नगरी रावतभाटा धर्म नगरी के रूप में जाने जाने लगी गुरु शिष्य का मिलन एक नया इतिहास रच गया
जब पूर्व में विराजित मुनि श्री शुद्ध सागर जी महाराज एवं मंगल विहार करके पहुंचे संकल्प सागर जी महाराज एवं सद्भाव सागर जी महाराज ने जब अपने गुरु आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज की मंगल आगवानी की तो सारा दृश्य भक्ति में हो गया

और सभी मौजूद भक्त भावुक हो गए संपूर्ण भारतवर्ष और संपूर्ण विश्व की निगाहें इन दृश्यों को टीवी चैनल यूट्यूब के माध्यम से देख रही थी और सभी मौजूद पत्रकार बंधु भी इसके छायाचित्र लेते दिखाई पड़े और कोई इसकी रिकॉर्डिंग लेता दिखाई दिया।






पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज अपने संघ सहित बड़ौत उत्तर प्रदेश से 555 किलोमीटर का पैदल बिहार करते हुए भीषण सर्दी में नगर में आगमन हुआ। इसको लेकर नगर वासियों में भी काफी उत्साह था।

जब यह मिलन हुआ तब समस्त शिष्यों ने अपने गुरु आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर महाराज के समक्ष परिक्रमा की और गुरुदेव के चरण पखार कर मंगल आशीष लिया। ऐसा लग रहा था की गुरुकुल की परंपरा आज भी जीवित है।
पूज्य गुरुदेव के चरणों का प्रक्षालन पूज्य मुनि श्री 108 शुद्ध सागर महाराज एवं संकल्प सागर महाराज सद्भाव सागर महाराज ने किया जब यह मुनिराज गुरुदेव के चरणों का प्रक्षालन कर रहे थे तब उनके मुख्य भाव विह्वल थे। हो क्यों ना हो साक्षात गुरुदेव जो पधारे हैं। निश्चित रूप से यह मिलन विनम्रता शिष्य का गुरु के प्रति विनय भाव का एक अनुपम उदाहरण दे रहा था। जो युगों युगों तक इतिहास के पन्नों पर जीवित रहेगा।
पूज्य आचार्य श्री ने मंगल प्रवचन देते हुए सभी को पटाखे का त्याग करवाया और नमोस्तु नमोस्तु की जय कारे गूंज रहे थे। आचार्य श्री ने कहा कि एक मुनिराज दिख जाए तो मनुष्य का भाग खुल जाता है आपके यहां तो 30 से अधिक मुनिराज एक छत के नीचे आए हैं। तो संपूर्ण नगर का भाग्य जा चुका है।
उन्होंने गुरु की महिमा का बखान करते हुए कहा कि जीवन में गुरु के प्रति जो आस्था है तो उसके भाग्य का रास्ता अपने आप खुल जाता है। आपको जैन धर्म में उत्तम कुल प्राप्त हुआ है। उन्होंने सीख दी की जगत को छोड़ दो और ज्ञान को कभी मत छोड़ो। उन्होंने कहा जितने अच्छे लोग देश में जन्म लेगे उतना ही देश उन्नति करेगा। और तेजस्वी बनेगा।
संसार की विचित्रता के बारे में कहा कि संसार में स्वार्थ भरा है, लोग राग द्वेष में पड़े है। राग को मिटाए मुनि शरण में आए। ताकि विश्व कल्याण के इस पुनीत कार्य को पूर्ण कर सकें।
उन्होंने कहा कि अच्छे ज्ञान से ही मोक्ष मिलता है। अक्षय ज्ञान की अलम है और ग्रंथ साधन है, साध्य तो आत्मज्ञान है। साधना ही साधन है। किसी साधना सामान्य साधना से कुछ साधन छूटते नही है, उन्होंने कहा कि जब तीर्थंकरों का जन्म होता है तब बाजे बजते हैं पटाखे नहीं चलते आतिशबाजी नहीं होती। उनके जन्म पर साढ़े बारह करोड़ बाजे बजते है। उनके जन्म से तीन लोक में खुशियां छा जाती हैं। भगवान के आशीर्वाद से ही भाग्य बनता है।
महाराज श्री ने अपना तन मन बदलने की बात करते हुए कहा कि हम सभी अलग-अलग प्रांतों को छोड़कर अणु नगरी में इसलिए आए हैं कि पंचकल्याणक के माध्यम से तन मन बदल सकें। हम जीवन जिएंगे और जीने दे की भावना प्रबल करे। ज्ञान ही साधन है, और हम ज्ञान से ही समाज में नए बदलाव, सुधार के लिए मनी बनाएंगे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
