विदेश में रहें, लेकिन हृदय में भारत और जीवन में जैन संस्कार जीवित रखें : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

धर्म

# विदेश में रहें, लेकिन हृदय में भारत और जीवन में जैन संस्कार जीवित रखें : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

**धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहे, आजीविका में भी झलके नैतिकता और अहिंसा; धन के साथ संस्कार, सदाचार और समाजहित को भी दें महत्व**

**सम्मेदशिखरजी।**

राष्ट्रसंत मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि विदेश में रहना गलत नहीं है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों, धार्मिक परंपराओं और संस्कारों को भूल जाना उचित नहीं है। व्यक्ति चाहे भारत में रहे या देश की सीमाओं से बाहर, उसके हृदय और आचरण में भारत की संस्कृति तथा जैन धर्म के सिद्धांत जीवित रहने चाहिए। उन्होंने प्रेरक संदेश देते हुए कहा, **“तुम भारत में रहो या भारत की सीमा से बाहर, तुममें भारत होना चाहिए।”**

 

 

मुनि श्री ने कहा कि विदेशों में रहने वाले जैन परिवार जिनालयों के निर्माण, धार्मिक आयोजनों और पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं के माध्यम से जैन संस्कृति के संरक्षण एवं प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। अपनी जन्मभूमि से दूर रहकर भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहना और अगली पीढ़ी तक धर्म-संस्कार पहुंचाना प्रत्येक परिवार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

 

 

गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ ने बताया कि मुनि श्री के शंका समाधान कार्यक्रम में जीवन, धर्म, अर्थार्जन, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक दायित्वों से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर मार्गदर्शन मिला।

 

### धन कमाना ही नहीं, उसे धर्म से जोड़ना भी जरूरी

मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि धर्म केवल मंदिर जाने, पूजा-पाठ करने या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं होना चाहिए। धर्म की वास्तविक अभिव्यक्ति व्यक्ति की आजीविका, व्यवहार, विचारों और सामाजिक जिम्मेदारियों में भी दिखाई देनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि जीवन में धन की आवश्यकता है, लेकिन आजीविका का माध्यम हिंसामुक्त, शोषणमुक्त और नैतिकता पर आधारित होना चाहिए। धन कमाने के साथ उसका सदुपयोग करना और समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना भी आवश्यक है।

मुनि श्री ने प्रेरक संदेश देते हुए कहा, **“पैसा कमाना अर्थार्जन है और धर्म से जुड़कर धनार्जन करना अर्थ-पुरुषार्थ है।”** जीवन की वास्तविक सफलता केवल आर्थिक समृद्धि में नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, संस्कारों और समाज के प्रति संवेदनशीलता में भी निहित है।

 

### सकारात्मक भावनाएं जीवन को बनाती हैं सहज

शंका समाधान के दौरान मुनि श्री ने भावना योग के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सकारात्मक भावनाएं जीवन में सहजता, संतुलन और सद्भाव लाती हैं। किसी भी संकल्प को लेने या वचन देने से पहले गंभीरता से विचार करना चाहिए, क्योंकि वचन का पालन करना व्यक्ति के नैतिक दायित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

उन्होंने कहा कि दान की घोषणा भी केवल औपचारिकता बनकर नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसके पीछे त्याग, समर्पण और संकल्प की सच्ची भावना होनी चाहिए। व्यक्ति को अपनी क्षमता और जिम्मेदारी को समझते हुए ही संकल्प लेना चाहिए तथा उसे पूरा करने का ईमानदार प्रयास करना चाहिए।

 

 

### AI से तैयार धार्मिक सामग्री को बिना जांचे न मानें प्रामाणिक

धार्मिक विषयों पर मुनि श्री ने विवेक, प्रमाणिकता और शास्त्रीय आधार को आवश्यक बताया। उन्होंने समझाया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) से तैयार धार्मिक वीडियो, संदेशों अथवा जानकारियों को बिना जांचे आगम-सम्मत नहीं मान लेना चाहिए। धार्मिक सामग्री को स्वीकार करने से पहले उसके शास्त्रीय आधार और प्रामाणिकता की पड़ताल जरूरी है।

प्राचीन जैन प्रतिमाओं के अभिषेक जैसे विषयों पर भी उन्होंने परंपराओं और प्रचलित धार्मिक व्यवस्थाओं को समझकर विवेकपूर्ण निर्णय लेने की आवश्यकता पर बल दिया। धार्मिक आस्था के साथ सही जानकारी और शास्त्रीय मर्यादा का ध्यान रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

 

 

### पारिवारिक विवादों का समाधान संवाद और समझदारी से हो

समाज और परिवार से जुड़े प्रश्नों पर मार्गदर्शन देते हुए मुनि श्री ने मध्य प्रदेश से आए जैन अधिवक्ता के साथ चर्चा के संदर्भ में संवाद, धैर्य और जिम्मेदारी के महत्व को रेखांकित किया।

उन्होंने बताया कि पारिवारिक विवादों में अहंकार और अवास्तविक अपेक्षाओं के बजाय पारस्परिक सम्मान, सहनशीलता और समझदारी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। परिवारों में उत्पन्न मतभेदों को बढ़ाने के बजाय उन्हें आपसी बातचीत और सकारात्मक दृष्टिकोण से सुलझाने का प्रयास करना चाहिए।

समाज के जागरूक और जिम्मेदार लोगों की भी भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्हें केवल विवादों के समाधान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि परिवारों में सौहार्द, विश्वास और आपसी सहयोग का वातावरण बनाने की दिशा में भी प्रयास करना चाहिए।

 

 

### धार्मिक आयोजनों में सुविधाओं को समयानुकूल बनाने पर जोर

सामाजिक एवं धार्मिक आयोजनों की व्यवस्थाओं पर चर्चा करते हुए शुद्ध भोजन की व्यवस्था और टिफिन जैसी सुविधाओं को समयानुकूल बनाने की आवश्यकता का विषय भी सामने आया। ऐसी व्यवस्थाएं धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं और विशेषकर एकल परिवारों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं।

मुनि श्री के शंका समाधान का व्यापक संदेश यही रहा कि धर्म का प्रभाव व्यक्ति के संपूर्ण जीवन में दिखाई देना चाहिए। संस्कृति और संस्कारों का संरक्षण, नैतिक आजीविका, धन का सदुपयोग, वचन की मर्यादा, शास्त्रों के प्रति प्रामाणिकता तथा परिवार और समाज में सद्भाव—ये सभी जीवन को सार्थक बनाने के महत्वपूर्ण आधार हैं।

**संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी**9929747312

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