महाराज परोपकार, पारिवारिक संस्कार और सम्यक् दर्शन से ही होगा जीवन का कल्याण आर्जवसागर

धर्म

 

महाराज परोपकार, पारिवारिक संस्कार और सम्यक् दर्शन से ही होगा जीवन का कल्याण आर्जवसागर

 

**बड़ौत।** 

 

अजितनाथ सभागार में विराजमान परम पूज्य आचार्य श्री 108 आर्जवसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में परोपकार, पारिवारिक संस्कार, सम्यक दर्शन तथा श्रीफल के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु का उपकार महान होता है। प्रकृति भी हमें निःस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देती है। वृक्ष स्वयं धूप सहकर दूसरों को फल देते हैं, नदियां निरंतर जल प्रवाहित करती हैं और गायें दुग्ध प्रदान करती हैं। इसके विपरीत, आज मनुष्य स्वार्थ और धन के कारण पारिवारिक संबंधों को कमजोर कर रहा है। भाइयों के बीच भेदभाव तथा परिवारों में बढ़ती दूरियां चिंता का विषय हैं। हमें प्रकृति से प्रेरणा लेकर सहयोग, प्रेम और परोपकार की भावना विकसित करनी चाहिए।

 

 

 

आचार्य श्री ने पारिवारिक धर्म एवं संस्कारों पर जोर देते हुए कहा कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में माता-पिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चों को केवल दूसरों के भरोसे छोड़ देना उचित नहीं है, बल्कि उन्हें स्वयं अच्छे संस्कार देने चाहिए। बच्चों को जैन धर्म, धार्मिक पाठशालाओं और नैतिक शिक्षा से जोड़ना आवश्यक है। संस्कारवान बच्चे परिवार, समाज, धर्म और राष्ट्र का गौरव बढ़ाते हैं।

 

**सम्यक दर्शन आत्मकल्याण का आधार**

 

सम्यक दर्शन की महिमा बताते हुय आचार्य श्री ने कहा कि वीतरागी देव, शास्त्र और गुरु के प्रति सच्चा श्रद्धान आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। सम्यक दर्शन जीव के जीवन को सही दिशा प्रदान करता है और उसके आध्यात्मिक उत्थान का आधार बनता है। प्रत्येक व्यक्ति को सम्यक श्रद्धान के महत्व को समझकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।

 

**श्रीफल में छिपा है गहरा आध्यात्मिक संदेश**

 

श्रीफल अर्थात नारियल के आध्यात्मिक महत्व को समझाते हुए उन्होंने बताया कि नारियल का बाहरी आवरण और जटाएं परिग्रह त्याग तथा मुनि जीवन के केशलोंच की प्रेरणा देते हैं। उसके तीन नेत्र सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र रूपी रत्नत्रय की याद दिलाते हैं। बाहर से कठोर दिखाई देने वाला नारियल भीतर से कोमल और स्वच्छ होता है। इसी प्रकार गुरु नियमों और तपस्या में कठोर होते हुए भी हृदय से अत्यंत कोमल तथा वात्सल्यपूर्ण होते हैं।

     नारियल को बजाने पर उसके बाहरी आवरण और भीतरी गोले का अलग-अलग अनुभव शरीर और आत्मा के भेद को समझने की प्रेरणा देता है। यही भेदविज्ञान है, जिसके माध्यम से साधक शरीर से भिन्न अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रयास करता है।

    आचार्य श्री ने प्रेरणा दी कि मनुष्य को राग-द्वेष और स्वार्थ का त्याग कर परिवार में प्रेम एवं वात्सल्य बनाए रखना चाहिए। बच्चों को संस्कारित करना, परोपकार की भावना अपनाना तथा सम्यक दर्शन और गुरु द्वारा बताए मार्ग पर चलना ही जीवन को सार्थक बनाने की दिशा है।

    अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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