जीवन की सार्थकता इस बात में है कि हमारे होने से किसी का जीवन बेहतर हुआ या नहीं : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

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जीवन की सार्थकता इस बात में है कि हमारे होने से किसी का जीवन बेहतर हुआ या नहीं : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी महाराज

सोनकच्छ

परोपकार, करुणा और सेवा से सार्थक बनाएं जीवन; सफलता से बढ़कर है दूसरों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना जीवन तो सभी जीते हैं, लेकिन जीवन की वास्तविक सार्थकता इस बात में है कि हमारे होने से किसी दूसरे का जीवन बेहतर हुआ या नहीं। किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना, किसी के दुःख को कम करना और निराश व्यक्ति को आशा की नई किरण दिखाना ही मानव जीवन की सच्ची उपलब्धि है।

 

 

यह प्रेरणादायी संदेश व्रत चक्रवर्ती, पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने अपने लिखित संदेश के माध्यम से दिया।

 

वर्तमान में अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज मौन साधना एवं एकांतवास में रहकर आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना कर रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने अपने लिखित संदेश में मानव जीवन के उद्देश्य, परोपकार और करुणा का महत्व समझाया है।

 

सफलता से बढ़कर है जीवन की सार्थकता

 

आचार्य श्री ने संदेश में कहा कि मनुष्य का जीवन केवल सांस लेने, धन कमाने, मकान बनाने और अपने परिवार तक सीमित रहने के लिए नहीं मिला है। जीवन की वास्तविक सार्थकता तब है, जब हमारे कारण किसी के चेहरे पर मुस्कान आए, किसी का दुःख कम हो, किसी निराश व्यक्ति को आशा मिले और किसी भटके हुए व्यक्ति को सही दिशा प्राप्त हो।

 

उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि सांस लेना जीवन है, लेकिन किसी की सांसों का सहारा बन जाना जीवन की सार्थकता है। सफलता का अर्थ यह है कि हमने जीवन में कितना कमाया, कितना पाया और कितना हासिल किया, जबकि सार्थकता का अर्थ है कि हमने कितना बांटा, कितने लोगों को सहारा दिया और कितनों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाया।

 

प्रकृति सिखाती है परोपकार का पाठ

 

आचार्य श्री ने स्वार्थ से परमार्थ की ओर बढ़ने का आह्वान करते हुए कहा कि प्रकृति हमें प्रतिदिन परोपकार का पाठ पढ़ाती है। वृक्ष स्वयं धूप सहकर दूसरों को छाया देते हैं, नदियां बहकर दूसरों की प्यास बुझाती हैं और दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है। ऐसे में मनुष्य को भी केवल अपने सुख की चिंता तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

 

उन्होंने कहा कि अपने ज्ञान से किसी को सही मार्ग दिखाएं, अपने समय से किसी दुःखी व्यक्ति को सहारा दें और अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी असहाय की सहायता करें। दूसरों के काम आने वाला जीवन ही वास्तव में मूल्यवान जीवन है।

 

संपत्ति नहीं, सत्कर्मों से बनती है सच्ची विरासत

 

आचार्य श्री ने जीवन की नश्वरता का स्मरण कराते हुए कहा कि एक दिन शरीर मिट्टी में मिल जाएगा, धन-संपत्ति यहीं रह जाएगी और पद-प्रतिष्ठा भी पीछे छूट जाएगी। लेकिन व्यक्ति के सत्कर्म, संस्कार, करुणा और परोपकार लोगों के हृदय में लंबे समय तक जीवित रहते हैं।

 

इसलिए मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए कि उसके जाने के बाद लोग उसकी संपत्ति नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व, अच्छे कार्यों और सेवा भावना को याद करें। यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि और सच्ची विरासत है।

 

प्रतिदिन स्वयं से करें आत्मचिंतन

 

आचार्य श्री ने आत्मचिंतन का संदेश देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को रात में सोने से पहले स्वयं से तीन प्रश्न पूछने चाहिए—आज मेरे कारण किसके चेहरे पर मुस्कान आई? आज मैंने किसके दुःख को कम किया? आज मैंने किसी के लिए ऐसा क्या किया, जिससे उसका जीवन थोड़ा बेहतर हुआ?

 

यदि इन प्रश्नों के उत्तर मिलने लगें, तो समझना चाहिए कि व्यक्ति जीवन की सार्थकता की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

 

आचार्य श्री का संदेश है कि जीवन की सार्थकता ‘मैं’ में नहीं, बल्कि ‘हम’ में है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन को परोपकार, करुणा, सेवा और सद्भाव से सार्थक बनाने का प्रयास करना चाहिए।

 

संदेश का मूल भाव यही है कि जीवन की महानता इस बात से नहीं मापी जाती कि हमने अपने लिए कितना किया, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि हमारे कारण कितने लोगों के जीवन में खुशियां, आशा और सकारात्मक बदलाव आए।

 

प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

 

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