खंडेनवमी पर तुलजापुर में पशुबलि की प्रथा पूरी तरह बंद हो : डॉ. कल्याण गंगवाल
**35 वर्षों के प्रयासों से 90 प्रतिशत बलि रुकवाने में सफलता का दावा, अब युवाओं से आगे आने की अपील**
**पुणे।*
* महाराष्ट्र के तुलजापुर स्थित मां तुलजाभवानी मंदिर में खंडेनवमी के अवसर पर होने वाली पशुबलि की प्रथा को पूरी तरह बंद करने की मांग उठी है। सर्वजीव मंगल प्रतिष्ठान के संस्थापक अध्यक्ष एवं प्राणी मित्र डॉ. कल्याण गंगवाल ने इस संबंध में राज्य सरकार और प्रशासन के विभिन्न अधिकारियों को पत्र भेजकर प्रभावी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने धार्मिक परंपराओं के निर्वहन में जीवों के प्रति दया, करुणा और अहिंसा की भावना को प्राथमिकता देने की अपील की है।
डॉ. गंगवाल के अनुसार, नवरात्रि के दौरान खंडेनवमी के अवसर पर तुलजाभवानी माता के मंदिर में बड़ी संख्या में पशु-पक्षियों की बलि दी जाती है। उनका कहना है कि धार्मिक आस्था के नाम पर होने वाली पशुबलि को रोकने के लिए कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ-साथ व्यापक जनजागृति भी आवश्यक है।


### 35 वर्षों से पशुबलि रोकने के लिए प्रयासरत
डॉ. कल्याण गंगवाल ने बताया कि वे पिछले 35 वर्षों से पशुबलि रोकने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। उनके अनुसार, इन प्रयासों के परिणामस्वरूप लगभग 90 प्रतिशत बलि रुकवाने में सफलता मिली है। हालांकि, इस प्रथा को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य अभी बाकी है।


उन्होंने कहा कि अब उनकी उम्र 82 वर्ष हो गई है और इस उम्र में लगातार भागदौड़ करना कठिन होता जा रहा है। ऐसे में उन्होंने जैन समाज सहित सभी संवेदनशील युवाओं से इस अभियान में सक्रिय रूप से जुड़ने का आह्वान किया है, ताकि शेष पशुबलि को भी रोका जा सके और बेजुबान जीवों को अभयदान मिल सके।


डॉ. गंगवाल ने अपील करते हुए कहा कि पशुओं के प्रति करुणा और जीवों की रक्षा का भाव समाज के प्रत्येक व्यक्ति में जागृत होना चाहिए। युवाओं की सहभागिता से इस दिशा में व्यापक जनजागरण खड़ा किया जा सकता है।
### प्रशासन को पत्र भेजकर कार्रवाई की मांग
डॉ. गंगवाल ने इस प्रथा को रोकने के लिए मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, संबंधित जिले के जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, तहसीलदार तथा न्यायिक अधिकारियों को पत्र भेजे हैं। उन्होंने प्रशासन से कानून के अनुरूप आवश्यक कदम उठाने और पशुबलि पर प्रभावी रोक सुनिश्चित करने की मांग की है।

उन्होंने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 सहित संबंधित कानूनी प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि पशुओं के प्रति क्रूरता रोकने के लिए उपलब्ध कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है। उनके अनुसार, धार्मिक आयोजनों में पशुओं के प्रति क्रूर व्यवहार को रोकने के लिए प्रशासन, सामाजिक संगठनों और आमजन को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
### जनजागृति से ही संभव है स्थायी बदलाव
डॉ. गंगवाल ने कहा कि पशुबलि जैसी प्रथाओं को समाप्त करने के लिए केवल कानूनी कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज में जागरूकता और संवेदनशीलता विकसित करना भी जरूरी है। जीवों के प्रति दया, करुणा और अहिंसा का संदेश जन-जन तक पहुंचाकर इस दिशा में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि युवा इस अभियान की जिम्मेदारी संभालें और समाज का सहयोग मिले, तो तुलजापुर में पशुबलि की प्रथा को पूरी तरह बंद कराने के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।
**डॉ. कल्याण गंगवाल की अपील है कि सभी युवा इस अभियान से जुड़ें, पशुओं को अभयदान दिलाने में सहयोग करें और अहिंसा एवं जीवदया के संदेश को जन-जन तक पहुंचाएं।**
*डॉ. कल्याण गंगवाल, एम.डी. (मेडिसिन), पुणे*
प्रकाशन से पहले एक जरूरी संपादकीय सुझाव: मूल सामग्री में अदालतों के निर्देशों और विभिन्न राज्यों में पशुबलि पर रोक संबंधी कानूनी दावों का उल्लेख है। इन्हें प्रकाशित करने से पहले संबंधित आदेशों और कानूनी प्रावधानों की पुष्टि कर लें। इसी तरह, 90 प्रतिशत बलि रुकने का आंकड़ा डॉ. गंगवाल के दावे के रूप में ही रखा गया है।
